🌸 नवरात्रि 2025 — पहला दिन : माँ शैलपुत्री 🌸
📅 नवरात्रि 2025 की शुरुआत : 22 सितंबर 2025 (सोमवार)
इस दिन माँ शैलपुत्री की पूजा होती है।
माता के इस स्वरूप को नवरात्रि का प्रारंभिक और सबसे महत्वपूर्ण रूप माना जाता है।
🌺 माँ शैलपुत्री का परिचय
पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। ये नवरात्रि की प्रथम देवी हैं और सती का अगला जन्म मानी जाती हैं। इनके दाएँ हाथ में त्रिशूल, बाएँ हाथ में कमल और वाहन नंदी (बैल) है।
माँ शैलपुत्री की आराधना से स्थिरता, धैर्य और आत्म-विश्वास की प्राप्ति होती है। इन्हें प्रकृति और शक्ति का प्रथम स्वरूप भी कहा गया है।
📖 जन्म कथा
जब सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर अग्निकुंड में आत्मदाह कर लिया, तो अगले जन्म में वे पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में प्रकट हुईं। इसी कारण इनका नाम पड़ा — शैलपुत्री।
इस जन्म में माता ने कठोर तपस्या की और भगवान शिव को पुनः अपने पति रूप में प्राप्त किया। यह कथा बताती है कि सच्चा प्रेम और भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाता।
माँ शैलपुत्री का वाहन नंदी बैल है, जो भगवान शिव का भी वाहन और परम भक्त माना जाता है। नंदी पर सवार होकर माँ शैलपुत्री यह संदेश देती हैं कि साधक को जीवन में धैर्य, स्थिरता और संयम रखना चाहिए। नंदी बैल शक्ति, परिश्रम और अटूट निष्ठा का प्रतीक है, जो भक्तों को यह सिखाता है कि निरंतर प्रयास और एकनिष्ठ भक्ति से हर लक्ष्य को पाया जा सकता है। शास्त्रों के अनुसार, माँ शैलपुत्री की आराधना करने से व्यक्ति को आत्मबल, साहस और धर्म में स्थिरता मिलती है। साथ ही, विवाह और पारिवारिक जीवन की समस्याएँ दूर होती हैं तथा साधक को सुख-समृद्धि और अध्यात्म की ओर प्रवृत्ति प्राप्त होती है।
🌞 ज्योतिषीय महत्व
माँ शैलपुत्री का संबंध चंद्रमा से माना जाता है। जिन व्यक्तियों की जन्म कुंडली में चंद्रमा कमजोर हो, उन्हें शैलपुत्री माता की पूजा अवश्य करनी चाहिए।
🌸 लाभ: मानसिक शांति, भावनात्मक स्थिरता, चित्त की एकाग्रता और पारिवारिक सुख-समृद्धि।
🌸 माँ शैलपुत्री पूजा 2025 🌸
📅 नवरात्रि प्रथम दिवस का शुभ मुहूर्त
कलश स्थापना व पूजा का शुभ मुहूर्त :
⏰ प्रातः 06:12 बजे से 08:20 बजे तक (22 सितंबर 2025)
⏰ अभिजीत मुहूर्त : दोपहर 12:05 से 12:55 बजे तक
✅ इस समय पूजा करने से विशेष सिद्धि प्राप्त होती है।
🪔 पूजा की आवश्यक सामग्री
- माता की तस्वीर या मूर्ति
- पीला/लाल कपड़ा
- रोली, हल्दी, कुमकुम, अक्षत
- धूप, दीपक और घी
- फूल (विशेषकर लाल और पीले)
- फल, मिठाई, नैवेद्य
- पान, सुपारी, नारियल
- कलश (जल, आम के पत्ते और नारियल सहित)
🙏 पूजा विधि
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूर्व दिशा में लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माता की प्रतिमा स्थापित करें।
- कलश स्थापना करें और नारियल, आम के पत्ते लगाएँ।
- धूप, दीपक जलाकर माता का ध्यान करें।
- रोली, अक्षत, पुष्प अर्पित करें।
- फलों व मिठाई का नैवेद्य चढ़ाएँ।
- माँ शैलपुत्री के मंत्रों का जाप करें।
📿 शैलपुत्री माता के मंत्र
🌸 ध्यान मंत्र :
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
🌸 स्तुति मंत्र :
या देवी सर्वभूतेषु माँ शैलपुत्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
🌸 बीज मंत्र :
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
🌸 मूल मंत्र :
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
🌺 माँ शैलपुत्री की आराधना से लाभ और सिद्धियाँ 🌺
✨ शैलपुत्री माता की कृपा से मिलने वाली सिद्धियाँ
- कुण्डलिनी जागरण की प्रथम सीढ़ी यही हैं।
- साधक को ध्यान और योग में सिद्धि प्राप्त होती है।
- जीवन से भय, असुरक्षा और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
- आध्यात्मिक साधना करने वाले को मोक्ष मार्ग में सफलता मिलती है।
- मन और मस्तिष्क में शांति तथा स्थिरता आती है।
🌸 शैलपुत्री पूजा से लाभ
✅ विवाह में आ रही अड़चनें दूर होती हैं।
✅ वैवाहिक जीवन में सुख और सौभाग्य की वृद्धि होती है।
✅ संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है।
✅ धन, सुख, सौभाग्य और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है।
✅ जीवन में स्थिरता और सफलता प्राप्त होती है।
🪔 विशेष उपाय
- नवरात्रि के पहले दिन माता को गुलाबी या लाल फूल अर्पित करने से प्रेम और सौभाग्य बढ़ता है।
- घी का दीपक जलाकर शैलपुत्री की आरती करने से घर में समृद्धि आती है।
- चावल का भोग लगाने से जीवन में स्थिरता आती है।
- ब्राह्मण को भोजन कराने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है।
📌 व्रत करने के नियम
- व्रतधारी को प्रातःकाल स्नान करके माता का ध्यान करना चाहिए।
- दिनभर सात्विक रहकर केवल फलाहार या दूध ग्रहण करना चाहिए।
- संध्या समय पुनः दीपक जलाकर माता की आरती करें।
- व्रत का संकल्प पूरा होने पर ब्राह्मण या कन्या को भोजन कराएँ।
🌸मिथिला की विशेष परंपरा
मिथिला क्षेत्र (बिहार और नेपाल का तराई इलाका) में नवरात्रि का विशेष महत्व है।
यहाँ लोग मानते हैं कि पूरे 9 दिन का उपवास करने से जीवन में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति मिलती है। उपवास की शुरुआत पहले दिन कलश स्थापना के साथ होती है और नवमी तक चलती है।
इसी दिन घर में अखंड दीप जलाने की परंपरा भी होती है, जो नौ दिनों तक लगातार जलता है — इसे घर में शुभता, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
कई भक्त केवल फलाहार और जल पर रहते हैं, जबकि कुछ लोग अन्न और नमक का पूरी तरह त्याग कर देते हैं। महिलाएँ विशेष रूप से नवरात्रि के व्रत को परिवार की भलाई और संतान की लंबी उम्र के लिए करती हैं।
🌼 माँ शैलपुत्री की आरती 🌼
जय शैलपुत्री माता, जय जय शारदे माता।
करुणा के सागर माता, त्राहि त्राहि भव माता॥
श्वेत वस्त्रधारी माता, नन्दनवन में विचरती।
भक्ति से जो भी गाए, कष्ट सभी हरती॥
त्रिनेत्र धारी माता, चन्द्रमुकुट सुहावन।
भक्तों के संकट हरती, देती सुख अपारन॥
आरती शैलपुत्री की, जो जन मन से गाए।
दरिद्रता दूर हो जाती, सुख-समृद्धि पाये॥
📖 व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, हिमालयराज के घर जन्मी पार्वती ही शैलपुत्री कहलाती हैं।
पिछले जन्म में ये सती थीं जिन्होंने दक्ष यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन न कर प्राण त्याग दिए थे।
अगले जन्म में वे पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में प्रकट हुईं और इन्हें शैलपुत्री कहा गया।
नवरात्रि के प्रथम दिन इनकी पूजा करने से कुण्डलिनी जागरण की शुरुआत होती है।
भक्त की साधना सफल होती है और उसके जीवन में सुख-शांति आती है।
❓ FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
Q1: माँ शैलपुत्री की पूजा किसे करनी चाहिए?
👉 जिन्हें वैवाहिक जीवन, संतान सुख और जीवन स्थिरता चाहिए, उन्हें यह पूजा अवश्य करनी चाहिए।
Q2: पूजा में कौन-सा भोग सबसे शुभ है?
👉 चावल और घी का भोग चढ़ाना सबसे शुभ माना जाता है।
Q3: क्या व्रत में अनाज खा सकते हैं?
👉 नहीं, व्रत में केवल फलाहार, दूध और सात्विक आहार लेना चाहिए।
Q4: शैलपुत्री की पूजा का सर्वोत्तम समय कौन-सा है?
👉 प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त या नवरात्रि का विशेष मुहूर्त सबसे शुभ होता है।
🌺 निष्कर्ष / विशेष संदेश
नवरात्रि के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा करने से जीवन की सभी कठिनाइयाँ दूर होती हैं। साधक के जीवन में स्थिरता, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति आती है। शैलपुत्री माता की कृपा से व्यक्ति को वैवाहिक सुख, संतान सुख और जीवन में सफलता प्राप्त होती है। जो भक्त पूरे नियम और श्रद्धा से इनकी पूजा करता है, उसके जीवन में कभी भी दरिद्रता और दुःख का वास नहीं होता।
📖 माँ शैलपुत्री की पौराणिक कथा
माँ दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री का जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ था। "शैल" का अर्थ है पर्वत और "पुत्री" का अर्थ है बेटी। इस प्रकार इन्हें पर्वतराज की पुत्री होने के कारण शैलपुत्री कहा जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माँ शैलपुत्री अपने पिछले जन्म में सती थीं। वे राजा दक्ष की पुत्री और भगवान शिव की पत्नी थीं। राजा दक्ष ने एक बार एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। सती यह अपमान सहन न कर सकीं और वे अपने पति शिव का अपमान देखकर क्रोधित हो उठीं। यज्ञ स्थल पर ही उन्होंने योग अग्नि द्वारा अपने प्राण त्याग दिए।
अगले जन्म में वे पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में प्रकट हुईं। यही शैलपुत्री के नाम से जानी गईं। नवरात्रि के पहले दिन इनकी पूजा का विशेष महत्व है क्योंकि इनकी आराधना से साधक की कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया शुरू होती है। देवी शैलपुत्री का वाहन वृषभ (बैल) है और उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएँ हाथ में कमल है।
📖 व्रत कथा
एक बार एक भक्त ने नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री का व्रत आरंभ किया। उसने पूरी श्रद्धा से उपवास रखा और माता का ध्यान करते हुए उनके मंत्रों का जप किया। रात को उसने केवल फलाहार करके माता की आरती की। अगले दिन उसे जीवन में एक बड़ा सुख प्राप्त हुआ और उसकी सभी कठिनाइयाँ धीरे-धीरे समाप्त हो गईं।
यह कथा इस बात का प्रतीक है कि जो भी भक्त सच्चे मन से माँ शैलपुत्री का व्रत करता है, उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और वह जीवन में हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है।
🌺 जय माँ शैलपुत्री 🌺
माँ शैलपुत्री का स्मरण करने मात्र से ही जीवन के सभी दुख दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
📿 माँ शैलपुत्री मंत्र
ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः॥
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
🌸 जय माता दी 🌸


