🌸 मधुश्रावणी व्रत: नवविवाहिता का पहला सौंदर्यपर्व
(श्रद्धा, संस्कृति और समर्पण का मधुर संगम)🪔🌿👰🏻♀️🐍📿💍🌸🧡
"श्रावण की भींगी हुई धरती पर जब पहली बार कोई नवविवाहिता अपने पैरों से तुलसी के आँगन में प्रवेश करती है, तब वह केवल बहू नहीं होती, वह एक साधिका होती है — एक ऐसी स्त्री, जो अपनी आत्मा में देवीत्व को जगाने निकली है।"
🌺 मधुश्रावणी — यह केवल एक व्रत नहीं है, यह वह मधुर आराधना है जहाँ एक स्त्री फूलों की डलिया में अपने प्रेम, श्रद्धा, और सौभाग्य को समेट कर देवताओं के चरणों में अर्पित करती है। यह वह पर्व है जहाँ नारी स्वयं को समर्पण की पराकाष्ठा पर ले जाती है — नियम, संयम और संस्कृति की दिव्य सरिता में स्नान करती है।
🕯️ यह वह अवसर है जहाँ स्त्री और देवी का भेद मिट जाता है — और हर नवविवाहिता, हर शाम पूजा चौक पर दीपक जलाकर यह कहती है:
"मैं स्वयं शक्ति हूँ। मेरी पूजा में ना केवल मंत्र है, ना केवल कथा — मेरी पूजा में है मेरा जीवन, मेरा सौंदर्य, मेरी आत्मा।"
🧡 मधुश्रावणी वह समय है जब नवविवाहिता अपने विवाह को केवल एक सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना में बदल देती है। हर फूल में उसकी भावना होती है, हर कथा में उसका श्रद्धा-गान, और हर नियम में उसका आत्मबल।
🐍 विषहरी देवी की कथा:
🐍 विषहरी देवी को लोग मनसा देवी भी कहते हैं। वे साँपों की देवी मानी जाती हैं और मान्यता है कि उनका जन्म भगवान शिव और माँ पार्वती की बेटी के रूप में हुआ था, लेकिन वह साँप के रूप में प्रकट हुई थीं।
🌿 मधुश्रावणी व्रत में विषहरी देवी की पूजा खास रूप से होती है। नवविवाहित महिलाएँ इस दिन उनसे अपने पति की लंबी उम्र, सुख-शांति और अच्छे दांपत्य जीवन की प्रार्थना करती हैं।
"व्रत का आरंभ तब पवित्र होता है, जब उसकी कथा से आत्मा काँप उठे…"
🐍 विषहरी माई की चेतावनी – श्रद्धा से रहित पूजा नहीं स्वीकार 🌿
एक प्रसिद्ध लोककथा है: एक नवविवाहिता पूजा तो कर रही थी, लेकिन उसका मन पूजा से जुड़ा नहीं था। रात को विषहरी माई उसके स्वप्न में आईं और चेतावनी दी कि जब तू प्रेम से, भक्ति से पूजा करेगी, तभी मुझमें माई का रूप प्रकट होगा।
अगले दिन बहू ने सच्चे मन से पूजा की — गीत गाया, हँसी बाँटी, फूल तोड़ते समय रो उठी। तब माई ने कहा:
"अब तू साधिका बन गई। तुझमें मेरी शक्ति है।"
📅 व्रत की तिथि और अवधि (2025)
- 🗓️ प्रारंभ: 15 जुलाई 2025 (श्रावण कृष्ण पंचमी)
- 🗓️ समापन – टेमी: 27 जुलाई 2025 (श्रावण शुक्ल तृतीया)
- 🕉️ अवधि: 13 दिन – हर दिन भक्ति, कथा, नियम और लोकसंस्कारों से भरपूर
🪷 पूजन विधि और नियम
- नमक वर्जित, केवल एक बार मीठा या अरवा भोजन
- रात्रि भोजन वर्जित
- पूजा सामग्री ससुराल से आती है:
- 🌿 मिट्टी की नाग-नागिन मूर्तियाँ
- 🌸 पुरइन पत्ते
- 🪔 दीपक, लाल सिंदूर, चूड़ियाँ, बिंदी
- 👗 साड़ी, और प्रसाद
ॐ विषहराय नमः। नागदेवाय नमः।
ॐ गौरीशंकराय नमः। श्रीमद्भक्ताय नमः॥
ॐ नागानां च सर्वेषां वसुनां च महामते।
नागराजाय नमस्तुभ्यं प्रणमामि शिवसुताः॥
🌼 बगिया से मंदिर तक – फूलों की यात्रा
"हम तोड़ब फूल बगिया से,
गौरी माई के चढ़ाएब।
नाग देवता के पूजन में,
हम अपन मन लहराएब।"
हर शाम नववधुएँ सहेलियों संग निकलती हैं — फूल तोड़ने, गीत गाने, हँसी बाँटने।
📖 लोककथाएँ: जब श्रद्धा बनी चमत्कार
🧝🏻♀️ द्रुपदावती की कथा: मधुबनी की नवविवाहिता को स्वप्न में विषहरी माई ने दर्शन दिए और चेताया। अगले दिन उसने पूरी श्रद्धा से पूजा की और देवी ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए।
🐍 नागिन ब्राह्मणी बनी: एक नागिन ने ब्राह्मण रूप में जन्म लिया ताकि अपने नाग पति को पा सके। उसने हर नियम निभाया और टेमी पर अपने प्रिय को पाया।
🪔🌺 टेमी – मधुश्रावणी व्रत की अंतिम और शुभ रस्म
व्रत के अंतिम दिन नवविवाहिता के लिए ससुराल से मिठाई, वस्त्र, गहने और सुहाग सामग्री आती है। "टेमी दागना" एक परंपरा है जिसमें रुई की बाती से शरीर के कुछ भागों को हल्का सा दागा जाता है – यह प्रेम, सौभाग्य और बलिदान का प्रतीक है।
पति आँखें बंद कर बहू का साथ देता है ताकि डर का अनुभव न हो। बहू सुहागिनों को खोईछ भरती है, मिठाई बाँटती है और परिवार की समृद्धि के लिए प्रार्थना करती है।
🎶 लोकगीतों की श्रद्धा में डूबी आवाज़ें
"माय के अंगना बगिया लगै छै,
जैहौं तोड़ब फूल बनाके डालिया।
गौरी शंकर के पूजा करब,
बांचल रहथि मोर सजनवा।"
🌍 परंपरा की सीमाओं से परे
आज मधुश्रावणी दरभंगा, मधुबनी, नेपाल, दिल्ली, मुंबई, अमेरिका तक मनाया जाता है। जहाँ मिथिला की बेटियाँ हैं, वहाँ यह पर्व ज़िंदा है।
🌺 निष्कर्ष: मधुश्रावणी – जब स्त्री स्वयं देवी बनती है
- 🔸 स्त्री केवल पत्नी नहीं, संस्कृति की वाहिका है।
- 🔸 विवाह केवल संबंध नहीं, आत्मिक साधना है।
- 🔸 भक्ति केवल मंत्र नहीं, हृदय की पुकार है।
🌿 जय विषहरी माई! 🪔 जय गौरी शंकर! 🌸 जय मिथिला संस्कृति! 👰🏻♀️ जय नवविवाहिता की श्रद्धा!
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