सावन में क्यों गूंजती है हर हर महादेव की हुंकार? कांवड़ यात्रा की अद्भुत कथा

 


🕉️ कांवड़ यात्रा: जल नहीं, भक्ति की धार है यह 🌺🚩

🙏🏻 "सावन की पावन बयार में जब लाखों कांवड़िए सिर पर गंगाजल लेकर चलते हैं, तो वो केवल जल नहीं चढ़ाते... वो अपना तन, मन और आत्मा भोलेनाथ के चरणों में अर्पित करते हैं।"

ये यात्रा थकान की नहीं होती, ये तपस्या होती है। रास्ते में कहीं कोई सेवा कर रहा होता है, कहीं कोई खाने-पीने का सामान बाँट रहा होता है, कहीं किसी की चोट पर मरहम लग रहा होता है — यही है सच्चा धर्म।

💧 सावन और जल अर्पण का गहरा रहस्य

सावन वही मास है जब शिव ने हलाहल विष को अपने कंठ में धारण किया। तभी से भगवान शिव को गंगाजल अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है। ऐसा कहा जाता है कि सावन में गंगाजल अर्पण करने से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और हर मनोकामना पूरी करते हैं।

गंगाजल इस महीने में और भी पवित्र हो जाता है, और जब वह शिवलिंग पर गिरता है तो केवल जल नहीं गिरता... गिरती है भावनाएँ, समर्पण और अश्रु।



🔱 "कर्पूरगौरं कर्णावतारं..." का महाअर्थ 

"कर्पूरगौरं कर्णावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्।
सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥"

जो कपूर के समान गौर वर्ण के हैं, करुणा के साक्षात अवतार हैं, जो संसार के सार हैं, जिनके गले में सर्पों की माला है, जो सदा माता भवानी के साथ मेरे हृदय रूपी कमल में निवास करते हैं—ऐसे भगवान शिव को मैं नमन करता हूँ। 🕉️

यह मंत्र शिव की दिव्यता का सार है। कांवड़ यात्रा के दौरान भक्त जब यह मंत्र जपते हैं, तो वे शिव को अपने भीतर महसूस करते हैं। ये शब्द शिव के रूप, गुण और उनके आशीर्वाद की प्रतिध्वनि बन जाते हैं।

📿 जल को नीचे क्यों नहीं रखा जाता?

गंगाजल को माता गंगा का स्वरूप माना गया है। उसे नीचे रखना अपवित्रता मानी जाती है। इसीलिए कांवड़िए उसे सिर पर उठाकर, कांवर में बाँधकर, बिना एक क्षण भी ज़मीन पर रखे, अपने आराध्य तक पहुँचाते हैं। यह सच्ची भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है।


👣 श्रवण कुमार की कथा और आज के भक्तों की प्रेरणा

प्राचीन कथा है श्रवण कुमार की, जिन्होंने अपने अंधे माता-पिता को कांवर में बैठाकर चारों धाम की यात्रा कराई थी। आज के भक्त उसी परंपरा को जी रहे हैं। कई कांवड़िए आज भी अपने वृद्ध माता-पिता को कांवर पर बिठाकर पैदल यात्रा करते हैं — ये केवल सेवा नहीं, आत्मा की ऊँचाई है। शिव स्वयं ऐसे भक्तों की आरती उतारते हैं।

🌿 सावन में ही क्यों होती है यह यात्रा?

सावन शिव का प्रिय मास है। इसी मास में प्रकृति भी हरियाली से मुस्कुराती है, और मनुष्य का हृदय भी कोमलता से भर जाता है। मानसून के बाद गंगा में जल अधिक होता है, और इस मास में गंगाजल अत्यंत पवित्र माना जाता है। यही कारण है कि इसी महीने में कांवड़ यात्रा होती है — यह केवल परंपरा नहीं, एक आध्यात्मिक आवाहन है।

🍛 सेवा की मिसाल: कांवड़ियों को मिलती है निःशुल्क सुविधा

पूरे मार्ग पर शिवभक्तों के लिए कांवड़ सेवा शिविर लगाए जाते हैं। कहीं शुद्ध भोजन, कहीं शरबत, कहीं आराम के लिए बिस्तर — सब कुछ मुफ्त में। सेवा करने वाले कहते हैं, "भक्तों की सेवा ही भगवान की सेवा है।"

कई जगह डॉक्टर, दवाई, पैरों की मालिश तक की सुविधा होती है — बिना कोई मूल्य लिए। यह भारत की सेवा भावना और भक्ति का अद्वितीय संगम है।


📖 एक और कहानी: रत्नक की भक्ति यात्रा

एक डाकू रत्नक सावन में एक दिन शिवभक्तों की कांवर यात्रा देखकर विचलित हुआ। उसने चोरी की नीयत से कांवर उठाई, पर उसी क्षण उसकी आत्मा काँप उठी। उसकी आँखों से आंसू बहने लगे, और वहीं से उसका जीवन बदल गया। आगे चलकर वही रत्नक वाल्मीकि ऋषि बना, जिन्होंने रामायण की रचना की।

सावन केवल मास नहीं, आत्मा के जागरण का समय है।

✨ कांवर यात्रा में बोले जाने वाले मंत्र:

  • 🔱 ॐ नमः शिवाय
  • 🔱 हर हर महादेव
  • 🔱 बोल बम! बोल बम!
  • 🔱 उज्जैनी के राजा महाकाल की जय!

🌼 और भी भावनाओं के लिए पढ़िए मेरा ब्लॉग:
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