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| एक महिला शांतिपूर्ण साधना करते हुए सौंदर्य दर्शाती है। |
🌸 सत्ययुग में सौंदर्य के रहस्य और उनसे जुड़ी दिव्य कथाएँ 🌸
जहाँ सौंदर्य था आत्मा का प्रकाश, भक्ति का फूल और साधना का परिणाम
🌺 📖 भूमिका: जब सौंदर्य तप और संयम का फल था
सत्ययुग! यह केवल एक कालखंड नहीं, बल्कि वह दिव्य युग था जब मानव स्वयं धर्म था, जब सौंदर्य बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि भीतरी शुचिता और भक्ति का दर्पण था। उस समय न कोई रसायन था, न सौंदर्य प्रसाधन – फिर भी वहाँ की स्त्रियाँ और पुरुष इतने सुंदर थे कि उन्हें देखकर स्वयं देवता भी विस्मित हो जाते थे। उनका सौंदर्य उनके तप, उनकी वाणी की मधुरता, संयमित जीवन और प्रकृति से जुड़े रहन-सहन से उत्पन्न होता था।
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🌼 🧘♀️ स्त्रियों के सौंदर्य उपाय – प्रकृति और पवित्रता का संयोग
सत्ययुग की स्त्रियाँ प्रकृति की गोद में रहती थीं। वे तुलसी के पत्तों को उबालकर उसके जल से स्नान करती थीं। यह तुलसी जल शरीर की ऊष्मा को शांत करता और त्वचा को दिव्यता प्रदान करता। सुबह सूर्योदय से पहले स्नान कर वे मिट्टी या चंदन से निर्मित उबटन लगाती थीं – जिसमें केसर, गुलाब की पंखुड़ियाँ, कपूर, मंजिष्ठा, आँवला, और हल्दी होती थी। यह उबटन न केवल शरीर को कोमल बनाता, बल्कि नकारात्मक ऊर्जा को भी दूर करता।
सौंदर्य केवल बाहरी नहीं होता था, वह मन से निकलता था – और इसलिए सत्ययुग की स्त्रियाँ व्रत रखती थीं। विशेषकर 'पद्म व्रत', 'सावन सोमवार', और 'शिव-गौरी उपासना' उनके सौंदर्य और सौभाग्य दोनों का कारण थे।
✨ देवी लक्ष्मी की कथा – सौंदर्य का व्रत
पुराणों में आता है कि एक बार देवताओं ने माता लक्ष्मी से पूछा, "हे देवी! आप सदैव इतना तेजस्वी और सुंदर कैसे रहती हैं?" माता बोलीं – "मैंने युगों तक शुक्रवार को पद्म व्रत किया। गंगाजल और चंदन से स्नान कर भगवान विष्णु को कमल पुष्प अर्पित करती रही। इसी व्रत से मेरा सौंदर्य चिरस्थायी हुआ।"
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| एक देवी का श्रृंगार |
🌸 सीता जी का दिव्य सौंदर्य
माता सीता, जो स्वयं धरती से उत्पन्न हुईं, उनके रूप में मातृत्व, सौम्यता और सात्त्विकता समाहित थी। मिथिला की महिलाएँ आज भी मानती हैं कि सीता जी तुलसी जल, चंदन, और औषधीय उबटन से स्नान करती थीं। वे प्रतिदिन शिव-गौरी की पूजा करतीं और अपनी वाणी में कभी कटुता नहीं आने देती थीं। उनका सौंदर्य उनका आचरण था – नख-शिख तक पवित्रता और प्रेम से भरा हुआ।
🧚♀️ सावित्री – सौंदर्य की तपस्विनी
सावित्री का सौंदर्य केवल उनके रूप में नहीं था, वह उनके धर्म में, उनके निश्चय में और उनके प्रेम में था। जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर चल दिए, तो सावित्री ने भूख-प्यास छोड़ तपस्या की। उनके तप से यमराज भी प्रभावित हुए और उन्हें सौंदर्य, सुख और पुनः पति प्राप्ति का वरदान दिया।
💫 पार्वती जी – सौंदर्य का स्वरूप
देवी पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए वर्षों तक केवल वायु सेवन कर तप किया। वे जंगलों में रहतीं, बर्फ में बैठतीं, और केवल ध्यान करतीं। उनका शरीर शुद्ध और सौंदर्य से युक्त था – जो न रंग से, न वस्त्र से, बल्कि शिव भक्ति से प्रकाशित होता था।
🌷 गोपियों का सौंदर्य – कृष्ण भक्ति की चमक
श्रीकृष्ण की गोपियाँ सौंदर्य का जीता-जागता उदाहरण थीं। वे प्रतिदिन घी, दूध और फूलों से स्नान करतीं, तुलसी की माला पहनतीं और श्रीकृष्ण के नाम का जप करती थीं। उनका सौंदर्य किसी श्रृंगार से नहीं, कृष्ण प्रेम से उत्पन्न होता था।
🧿 पुरुषों के सौंदर्य रहस्य
सत्ययुग के पुरुष भी सौंदर्य और तेज से भरपूर होते थे। वे ब्रह्मचर्य का पालन करते, सूर्योदय से पूर्व उठकर यज्ञ करते और पंचगव्य स्नान करते – गोमूत्र, दूध, दही, घी और गोबर से शरीर को शुद्ध करते। उनके चेहरों पर ओज और आंखों में तेज होता था। वे सूर्य नमस्कार से शरीर को सशक्त और आत्मा को प्रबल बनाते।
📿 तप, व्रत और संयम – सौंदर्य की जड़ें
सत्ययुग में सौंदर्य किसी दिखावे का नाम नहीं था। वहाँ सौंदर्य का अर्थ था – पवित्र मन, सच्चे विचार, मधुर वाणी, और धर्ममय जीवन। सत्य बोलना, सेवा करना, संयमित दिनचर्या, और शिव-गौरी की भक्ति – ये सभी मिलकर उस दिव्य आभा का निर्माण करते थे जो आज भी दुर्लभ है।
🕊️ क्या आज हम वैसा सौंदर्य प्राप्त कर सकते हैं?
उत्तर है – हाँ! यदि हम फिर से तुलसी जल से स्नान करें, प्राकृतिक उबटन लगाएँ, व्रत रखें, मन को संयमित करें, शिव की उपासना करें, और प्रेम तथा सेवा को अपनाएँ – तो सत्ययुग का वही दिव्य सौंदर्य आज भी हमारे जीवन में लौट सकता है। हमें सौंदर्य के आधुनिक मापदंड नहीं, बल्कि उस युग के पवित्र मूल्यों को अपनाना होगा।
🌼 निष्कर्ष: सौंदर्य की पुनर्परिभाषा
सत्ययुग का सौंदर्य अमर है, क्योंकि वह केवल त्वचा पर नहीं, आत्मा पर खिला हुआ कमल है। वह चंदन की ठंडक है, शिव की भक्ति है, तुलसी की पवित्रता है और सीता की शालीनता है। यदि हम आज भी उस सौंदर्य को प्राप्त करना चाहते हैं, तो हमें उसी पथ पर चलना होगा – जहाँ धर्म है, सेवा है, संयम है और भक्ति है।
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| चंदन के चमत्कारी गुण |
🌸✨ चंदन (चन्दनम्) — सत्ययुग से कलियुग तक सौंदर्य, भक्ति और मानसिक शांति का दिव्य उपाय ✨🌸
चंदन केवल एक सुगंधित लेप नहीं, बल्कि एक पवित्रता और शीतलता का प्रतीक है — जिसे सत्ययुग से लेकर आज तक ऋषियों, देवताओं, और भक्तों ने सौंदर्य, ध्यान, और ऊर्जा शुद्धि के लिए उपयोग किया है। यह न केवल शरीर को शीतल करता है, बल्कि मन को भी शांत करता है और चेहरे पर दिव्य तेज लाता है।
🌿 चंदन के चमत्कारी और धार्मिक उपयोग (उपाय)
1. 🌼 चेहरे पर चंदन का लेप लगाना
> प्रतिदिन सुबह चंदन (विशेषतः सफेद चंदन) को गुलाब जल या कच्चे दूध में मिलाकर माथे और चेहरे पर लगाएँ।
👉 यह सौंदर्य बढ़ाता है, त्वचा को चमकदार बनाता है, और चंद्रमा का दोष दूर करता है।
2. 🪔 पूजा में चंदन अर्पण करें
> शिवजी, विष्णु, राम, कृष्ण और देवी माँ को चंदन अर्पण करें। इससे पुण्य फल की प्राप्ति होती है और चित्त निर्मल होता है।
विशेषकर सोमवार, पूर्णिमा, और गुरुवार को चंदन पूजा अत्यंत फलदायक मानी जाती है।
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3. 📿 चंदन की माला से जाप करें
चंदन की माला का उपयोग कर यदि चंद्र, शिव या विष्णु मंत्रों का जाप किया जाए — तो मानसिक शांति, चेहरे पर तेज, और आत्मिक संतुलन प्राप्त होता है।
4. 🧴 चंदन उबटन बनाकर स्नान करें
> हल्दी, चंदन पाउडर, गुलाब की पंखुड़ी और दूध मिलाकर उबटन बनाएं। इससे तन सुगंधित, त्वचा कोमल और शरीर दिव्य आभा से युक्त होता है।
5. 🌙 चंद्र दोष या मन की चंचलता के लिए चंदन उपाय
> किसी भी सोमवार को सफेद चंदन को गंगाजल में घिसकर ‘ॐ सोम सोमाय नमः’ मंत्र बोलते हुए माथे पर तिलक करें।
👉 यह उपाय मन की बेचैनी, अनिंद्रा, और मानसिक अस्थिरता दूर करता है।
✨ चंदन से जुड़ी पौराणिक मान्यताएँ:
🕉️ श्रीकृष्ण के अंगों पर यमुनातट की गोपियाँ चंदन लगाती थीं — जिससे उनके रूप में सौंदर्य की आभा बनी रहती थी।
🕉️ शिवलिंग पर चंदन अर्पण करने से चंद्र दोष दूर होता है — क्योंकि चंद्रदेव स्वयं शिव की जटाओं में स्थित हैं।
🕉️ सीता माता प्रतिदिन चंदन लेप कर पूजा करती थीं — जिससे उनकी त्वचा स्वर्णवत हो गई थी।
📿 चंदन के साथ सिद्ध मंत्र:
ॐ गं गणपतये नमः – चंदन लेप करके गणेश जी को अर्पित करें।
ॐ नमः शिवाय – शिवलिंग पर चंदन चढ़ाकर इस मंत्र का जाप करें।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः – लक्ष्मी पूजन में चंदन से तिलक करें।
🌸 निष्कर्ष:
चंदन सत्ययुग से ही सौंदर्य, भक्ति, और मानसिक शांति का अमृततुल्य उपाय रहा है।
यदि आप इसके धार्मिक, आयुर्वेदिक और भावनात्मक स्वरूप को अपनाएँ — तो यह जीवन में दिव्यता, आकर्षण, और ऊर्जा भर देता है।
🌿 "चंदन है इस देश की माटी, तिलक करो इसके कण-कण का..." 🌿
-🌸✨ चंदन (चन्दनम्) — सत्ययुग से कलियुग तक सौंदर्य, भक्ति और मानसिक शांति का दिव्य उपाय ✨🌸
चंदन केवल एक सुगंधित लेप नहीं, बल्कि एक पवित्रता और शीतलता का प्रतीक है — जिसे सत्ययुग से लेकर आज तक ऋषियों, देवताओं, और भक्तों ने सौंदर्य, ध्यान, और ऊर्जा शुद्धि के लिए उपयोग किया है। यह न केवल शरीर को शीतल करता है, बल्कि मन को भी शांत करता है और चेहरे पर दिव्य तेज लाता है।
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| "चंदन के औषधीय गुण" |
🌺 सत्ययुग की स्त्रियों का दिव्य सौंदर्य – चंदन, उबटन और बालों के शुद्ध उपायों के साथ 🌺
✨ प्राचीन युग में सौंदर्य था तप और संयम का फल ✨
जब हम सत्ययुग की कल्पना करते हैं, तो हमारे मन में एक स्वर्णिम युग का चित्र उभरता है — एक ऐसा युग जहाँ न स्त्रियों में ईर्ष्या थी, न पुरुषों में लोभ, और न ही सौंदर्य को दिखावे की वस्तु माना जाता था। वहाँ का सौंदर्य था शुद्धता का, सात्विकता का, और सबसे बड़ी बात, प्राकृतिकता का। 🌿 उस समय की देवियाँ, ऋषिपत्नियाँ, और महारानियाँ — सभी अपने सौंदर्य की देखभाल प्रकृति से प्राप्त औषधियों, जड़ी-बूटियों और स्नेह से करती थीं।
☀️ 1. चंदन – त्वचा की शीतलता और तेज का रहस्य 🌙
सत्ययुग की महिलाएँ विशेष रूप से चंदन (Sandalwood) को अपने सौंदर्य-संवर्धन के लिए प्रयोग करती थीं। चंदन को शीतल, पवित्र और मन को शांत करने वाला माना जाता है। यह न केवल त्वचा को निखारता है, बल्कि मानसिक शांति भी देता है।
चंदन के मुख्य सौंदर्य उपयोग:
🌼 चंदन लेप (पेस्ट) –
सफेद चंदन को घिसकर उसमें गुलाब जल मिलाकर चेहरे और गर्दन पर लगाया जाता था। यह त्वचा को चमकदार और शीतल बनाता है।
🌼 झाइयों और मुहांसों के लिए –
चंदन + हल्दी + तुलसी पत्तों का लेप लगाया जाता था जिससे त्वचा रोग दूर होते और चेहरे पर एक दिव्य तेज आता।
🌼 पूजन से पूर्व –
स्त्रियाँ जब शिव-पार्वती या विष्णु लक्ष्मी की पूजा करती थीं, उससे पूर्व चंदन लेप से शरीर शुद्ध करती थीं — जिससे तन के साथ मन भी शुद्ध हो जाता।
🌼 गर्भवती स्त्रियों पर चंदन का लेप –
गर्भवती महिलाएँ अपने माथे पर और नाभि पर चंदन लगाती थीं, जिससे गर्भस्थ शिशु को भी शीतलता और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती।
✨ "जहाँ चंदन का लेप, वहाँ सौंदर्य का देवत्व!" 🌺
🌿 2. 'खान उबटन' – एक दिव्य आयुर्वेदिक उबटन जिसका नाम खुद में सौंदर्य मंत्र है ✨
सत्ययुग में ‘खान उबटन’ बहुत प्रसिद्ध था। यह उबटन घर में ही उपलब्ध वस्तुओं से तैयार होता था और विवाह, उपनयन, या विशेष पर्वों पर स्त्रियाँ इसका प्रयोग करती थीं। इसका नाम 'खान' संस्कृत शब्द 'कान्ति' और 'अन्न' से बना है — जिसका अर्थ है 'ऐसी संजीवनी जो अन्न की तरह त्वचा को पोषण दे।'
🍃 खान उबटन की सामग्री और विधि:
🔸 चने की दाल का बेसन (पिसा हुआ)
🔸 कच्चा दूध
🔸 हल्दी (प्राकृतिक)
🔸 चंदन का चूर्ण
🔸 कपूर (शुद्ध)
🔸 नींबू का रस या गुलाबजल
🔸 शहद (तुलसी मिश्रित)
👉 विधि:
सभी को मिलाकर एक गाढ़ा लेप तैयार किया जाता था और स्त्रियाँ इसे पूरे शरीर पर मलती थीं। यह उबटन:
✅ त्वचा को उज्ज्वल करता
✅ रोमछिद्रों को खोलता
✅ शरीर की दुर्गंध हटाता
✅ कांति और स्निग्धता बढ़ाता
✅ विवाह योग्य कन्याओं को सौभाग्य प्रदान करता
🔱 शास्त्रों में कहा गया है कि उबटन लगाना न केवल सौंदर्यवर्धक है, बल्कि यह एक आत्मिक प्रक्रिया भी है – एक आत्म-स्नान!
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| बालों के लिए दिव्य देखभाल |
🌸 3. बालों के लिए दिव्य देखभाल – प्रकृति से पाए सुंदर केश 🌸
सत्ययुग की स्त्रियों के बाल लंबे, घने, और सुगंधित होते थे। बालों की देखभाल भी चंद्रमा की शांति और वायु की गति के अनुसार की जाती थी। वे बालों को सजाने से अधिक, स्वस्थ रखने पर ध्यान देती थीं।
🪻 बालों की देखभाल के लिए प्राचीन उपाय:
🌿 नीम और आँवला तेल से मालिश:
सप्ताह में दो बार सिर में नीम के पत्तों और आँवले से बना तेल गर्म करके लगाया जाता। यह बालों को झड़ने से बचाता और डेंड्रफ को दूर करता।
🌿 शिकाकाई, रीठा, ब्राह्मी और हिबिस्कस का मिश्रण:
इन सभी को उबालकर जल तैयार किया जाता और इससे बाल धोए जाते।
🌿 बालों में गंगा जल और तुलसी का प्रयोग:
बाल धोने के बाद तुलसी के पत्तों वाला गंगाजल सिर पर डाला जाता जिससे मानसिक शांति मिलती और बालों की ऊर्जा भी बढ़ती।
🌿 सोने से पहले बालों में कंघी:
रात्रि को दक्षिण की दिशा में बैठकर 108 बार कंघी की जाती — इससे नींद अच्छी आती और बाल स्वस्थ रहते।
> 💠 "बाल न केवल स्त्री का सौंदर्य हैं, बल्कि उसके संस्कार और स्वास्थ्य का प्रतिबिंब भी हैं।"
💫 सत्ययुग की महिलाओं का सौंदर्य केवल तन का नहीं, मन का भी था 💫
🌺 वे मुस्कान में माधुर्य रखती थीं, आँखों में करुणा, और वाणी में सरस्वती का वास। सौंदर्य उनके आचरण से प्रकट होता था — परंतु उन्होंने कभी अपने सौंदर्य को अहंकार नहीं बनाया। उन्होंने प्रकृति की गोद में, तपस्या, संयम, और भक्ति से अपने रूप को सँवारा।
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📿 आज के युग में यह ज्ञान क्यों आवश्यक है?
वर्तमान युग में जहाँ सौंदर्य प्रसाधन रासायनिक हो गए हैं, वहाँ सत्ययुग की स्त्रियों के यह उपाय हमें पुनः प्रकृति से जोड़ते हैं। इन उपायों में:
✅ कोई साइड इफेक्ट नहीं
✅ केवल शुद्धता और सात्विकता
✅ आत्मबल और आत्मविश्वास
✅ मानसिक शांति और ऊर्जावान तेज
🕊️ अंतिम वाक्य – सौंदर्य वही जो आत्मा से झलके, और शरीर से दमके! 🕊️
🌸 हे बहनों, माताओं और कन्याओं! सत्ययुग की स्त्रियों के ये उपाय केवल त्वचा और बालों के लिए नहीं हैं, बल्कि वे जीवन जीने की एक शुद्ध पद्धति हैं। जब हम प्रकृति की ओर लौटते हैं, हम अपने मूल की ओर लौटते हैं – और वहीं है सच्चा सौंदर्य।
🌸 यह लेख आपके लिए "देव सृष्टि लोक" द्वारा श्रद्धापूर्वक समर्पित है 🌸




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