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| माता सिद्धिदात्री |
नवरात्रि का नवमी दिन: महा सिद्धिदात्री पूजा
नवरात्रि के नवमी दिन को महा सिद्धिदात्री कहा जाता है। यह दिन माता दुर्गा के शक्तिशाली रूप की पूर्णता और मनोकामनाओं की सिद्धि का प्रतीक माना जाता है।
माना जाता है कि नवमी पर माता दुर्गा अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं। यह दिन विशेष रूप से साधना और भक्ति के लिए उत्तम माना जाता है।
नवरात्रि नवमी दिन – तिथि और मुहूर्त
- दिन: नवमी (नौवें दिन)
- तारीख: 30 सितम्बर 2025, मंगलवार
- शुभ समय (पूजा मुहूर्त): सुबह 06:15 बजे से शाम 07:45 बजे तक
- कन्यापूजन मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से 03:00 बजे तक
- अशुभ समय: सुबह 10:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे
नवमी दिन विशेष रूप से महा सिद्धिदात्री पूजा और कन्यापूजन के लिए उत्तम माना जाता है। इस दिन मुहूर्त में पूजा करने से घर और परिवार में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
नवरात्रि नवमी पूजा विधि
नवमी दिन पर माता दुर्गा की महा सिद्धिदात्री पूजा विशेष विधि से की जाती है। इस दिन निम्नलिखित चरणों का पालन करना अत्यंत शुभ होता है:
- घर और पूजा स्थल की पूर्ण सफाई करें।
- सफेद या लाल वस्त्र पहनें और पूजा स्थान को फूल, दीपक और रंगोली से सजाएँ।
- माँ दुर्गा की आठ या नौ स्वरूपों की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- मंत्र जाप करें: "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" कम से कम 108 बार।
- अक्षत (चावल), हल्दी, कुमकुम, फल और मिठाई अर्पित करें।
- कन्याओं का स्वागत करें और उन्हें भोजन कराएँ।
- पूजा के अंत में आरती करें और माता से आशीर्वाद लें।
- प्रसाद वितरण के बाद परिवार और दोस्तों के साथ खुशी और समृद्धि की कामना करें।
नवमी पूजा से मन की अशांति दूर होती है और मानसिक शक्ति व सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है।
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| माँ दुर्गा |
माँ दुर्गा – स्वरूप, वाहन और महाकाव्य कथा
माँ दुर्गा, आदिशक्ति की अवतार, सम्पूर्ण ब्रह्मांड की पालनहार हैं। उनका रूप अत्यन्त दिव्य और अलौकिक है। वे सिंह पर सवार होकर युद्ध भूमि में असुरों का संहार करती हैं। साथ ही, माँ कमल पर भी विराजमान होती हैं, जो उनके शांत, करुणामयी और सौम्य स्वरूप का प्रतीक है।
माँ दुर्गा के हाथों में शस्त्र और प्रतीकात्मक वस्तुएँ हैं – त्रिशूल, गदा, चक्र, धनुष, तलवार, कमल और जपमाला। यह सभी उनके दिव्य शक्तियों का प्रतीक हैं, जो भक्तों को भय, नकारात्मकता और असुर शक्ति से मुक्ति दिलाते हैं।
माँ दुर्गा के नौ रूप हैं, जिन्हें नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है। प्रत्येक रूप का अपना विशेष महत्व है – कभी संहारक, कभी करुणामयी, कभी भक्तों को आशीर्वाद देने वाली। नवमी दिन पर उनके समस्त शक्तिशाली रूपों का समागम होता है।
माँ दुर्गा की कथा
पुराणों के अनुसार, महिषासुर नामक असुर ने वरदान प्राप्त किया था कि न देवता, न मनुष्य और न कोई पुरुष उसे मार सकेगा। इस वरदान से वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया और देवताओं को पराजित कर दिया। तब सभी देवताओं ने मिलकर माँ आदिशक्ति की उपासना की।
माँ दुर्गा ने अपने दिव्य और भव्य रूप में प्रकट होकर महिषासुर से युद्ध किया और उसे पराजित किया। इस प्रकार उन्होंने संसार को अधर्म से मुक्त किया और सभी पर कृपा की। यह रूप "महिषासुरमर्दिनी" के नाम से प्रसिद्ध है।
माँ दुर्गा का वाहन सिंह उनके साहस, शक्ति और संहारक स्वरूप का प्रतीक है। वहीं, कमल पर विराजमान उनका रूप करुणा, सौम्यता और आशीर्वाद देने वाली माता को दर्शाता है। यह द्वैत स्वरूप भक्तों को भक्ति और श्रद्धा के साथ मन, वचन और कर्म को शुद्ध रखने की प्रेरणा देता है।
नवदुर्गा की पूजा से भक्तों के जीवन में सुख, समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक शक्ति का संचार होता है। नवमी दिन इस दिव्यता का अनुभव करने और माता के आशीर्वाद को ग्रहण करने का सर्वोत्तम अवसर है।
कथा — महिषासुरमर्दिनी (माँ की विजय और करुणा)
बहुत पहले की बात है — धरती और स्वर्ग दोनों अँधेरे से घिरे थे। अधर्म ने रूप लिया था: महिषासुर नामक दैत्य ने अमरता का वरदान लेकर यह प्रण कर लिया कि न तो देवताओं से, न मनुष्यों से, न किसी पुरुष से उसे कोई मार सकेगा। वरदान की छाया में वह बढ़ता गया — ज्यों-ज्यों उसकी शक्ति बढ़ी, त्यों-त्यों संसार में असत्य और अनाचार फैल गए। खेत सूख गए, पुरखों की पूजा रुक गयी, देवी-देवताओं के पर्व मुरझा गए।
देवता चिंतित हुए। विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण और सबने मिलकर माँ से प्रार्थना की — “हे मातृशक्ति! अधर्म बढ़ गया है; धर्म संकट में है; संसार को तुम्हारी शक्ति की आवश्यकता है।” इन देवताओं की याचना से, ब्रह्मांड की सारी ऊर्जा एकाकार हो कर उत्पन्न हुई — वही साधारण मानव-सहायता से परे, एक दिव्य जननी का स्वरूप लेकर प्रकट हुई।
तब आईँ माँ दुर्गा — तेजस्वी, अनादरूप, करुणा और संहार दोनों के साथ। उनके मुख पर ध्रुव का भाव, आँखों में अनंत समर्पण और हाथों में देवताओं के दिए शस्त्र — त्रिशूल, खड्ग, चक्र, गदा — सब थे। उनका वस्त्र रक्तवर्ण, परे उनके चरणों में सिंह सवार था — सिंह जिसकी दहाड़ में धीरज और साहस था। किन्तु उसी माँ का एक सौम्य रूप भी था — कमल पर विराजित वह करुणामयी देवी, जिसका स्पर्श शुद्ध कर देता है।
युद्ध हुआ। महिषासुर ने रूप बदले — बंजर बलखाती हुई महाशक्ति प्रतीत हुई; पर माँ का प्रत्येक शस्त्र किसी न किसी रूप में सत्य और धर्म की हिफाज़त करता था। माँ ने महिषासुर के हर रूप का सामना किया — उसकी हर चाल को काटा, उसकी हर चाल में छिपी आत्म-रक्षा को भेद दिया। सिंह के पाँवों की थाप में धरती थरथराई, पर माँ का मन करुणा से भरा था — वह चाहती थीं कि यदि सम्भव हो, जीव को सुधरने का मार्ग मिले। पर महिषासुर ने अटल क्रोध और अहंकार से युद्ध करना जारी रखा।
जब तमाम युद्ध-यंत्र विफल हुए, माँ ने अन्ततः वह क्रियान्वित किया जो धर्म के लिए आवश्यक था — महिषासुर का संहार। पर उस विजय के क्षण में भी माँ की आँखों में मानव-सी ममता झलकती थी। उसका अंत केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं था; वह अधर्म के अंत और नये युग की शुरुआत थी — जहाँ वेद, धर्म और मानवता फिर से खिल उठें।
युद्ध के बाद माँ ने संसार को आश्वस्त किया — “मैं उसी रूप में रहूंगी जो तुम्हें सिद्धि दे, शांति दूँ और भय मिटाऊँ।” तब देवी के विभिन्न रूपों का समागम हुआ: कभी वे माँ जैसी कोमलता का प्रतिनिधित्व बनीं, तो कभी कठोर संहार के रूप में प्रकट हुईं — पर हर बार उनका उद्देश्य एक था: जीवों में धर्म, शक्ति और भक्ति लाना।
इसी महत्व और करुणा के कारण नवरात्रि में हम माँ के प्रत्येक रूप का स्मरण करते हैं — और नवमी पर विशेषकर उस रूप का, जो सिद्धिदात्री है: वह जो भक्त के हृदय की व्यथा समझकर उसे सिद्धि, आशीर्वाद और मन की शांति प्रदान करती है।
कथा का अंतिम भाव भावुक है — माँ की विदाई आने वाली है, भक्त के मन में घनघोर उदासी और अनंत श्रद्धा एक साथ होती है। आँखें नम हो जाती हैं, पर एक अटूट विश्वास भी जन्म लेता है कि माँ ने जो दिया, वह स्थायी है: साहस, संकल्प और भक्ति। यही वह विरासत है जो हर भक्त अपने साथ ले जाता है।
नवरात्रि नवमी – कन्यापूजन का महत्व
नवमी दिन पर कन्यापूजन का विशेष महत्व है। इस दिन नौ कन्याओं को माता दुर्गा का रूप मानकर पूजा की जाती है।
- कन्याओं को सुंदर वस्त्र पहनाएँ और उनका स्वागत करें।
- उनके पैर धोकर हल्दी, चंदन और सिंदूर से पूजन करें।
- फूल, मिठाई और फल अर्पित करें।
- कन्याओं को भोजन कराएँ और उन्हें दक्षिणा दें।
- कन्यापूजन से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
नवमी कन्यापूजन विधि
- सफेद या लाल रंग का आसन बिछाएँ और नौ कन्याओं को बैठाएँ।
- उनके सिर पर हल्दी और चंदन लगाएँ।
- फूल, मिठाई, फल और आभूषण अर्पित करें।
- कन्याओं को भोजन कराएँ और उनके आशीर्वाद प्राप्त करें।
- पूजा के अंत में कन्याओं को व्रत का प्रसाद दें।
नवमी पर कन्यापूजन से परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और माता दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
नवरात्रि नवमी – मंत्र और मन की शुद्धि
नवमी दिन (महा सिद्धिदात्री) पर मन की शुद्धि और मानसिक शक्ति के लिए विशेष मंत्रों का जाप करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।
नवमी मंत्र
- माँ दुर्गा का मूल मंत्र: “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे”
- जप संख्या: कम से कम 108 बार
- उच्चारण विधि: शांत और स्वच्छ स्थान पर बैठकर, दीपक जलाकर ध्यान के साथ मंत्र का जाप करें।
मन की शुद्धि विधि
- शांत स्थान पर बैठें और आंखें बंद करें।
- धीरे-धीरे श्वास लें और छोड़ें, मन को स्थिर करें।
- मन में सभी नकारात्मक विचारों और चिंता को छोड़ दें।
- मंत्र जाप करते हुए माता दुर्गा का रूप कल्पना करें।
- पूजा समाप्त होने के बाद मानसिक शांति और ऊर्जा का अनुभव करें।
नवमी दिन पर मंत्र जाप और ध्यान से मानसिक तनाव दूर होता है और व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा, धैर्य और शक्ति का विकास होता है।
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| पंडाल और मन दुर्गा की प्रतिमा |
नवरात्रि नवमी – कोलकाता के प्रसिद्ध पंडाल
कोलकाता में नवमी दिन पर महा सिद्धिदात्री और कन्यापूजन के लिए कई प्रसिद्ध पंडाल सजते हैं। यहाँ भक्त बड़ी संख्या में माता की पूजा और आराधना करने आते हैं।
- लेडीज़ क्लब, बेलीगंज: कलात्मक मूर्तियाँ और थीम आधारित पंडाल
- रासबिहारी एवेन्यू: रंग-बिरंगे प्रकाश और सांस्कृतिक कार्यक्रम
- लालबाज़ार पंडाल: पारंपरिक शैली और बड़ी मूर्तियाँ
- हेमंत पार्क: आधुनिक थीम और रोशनी का आकर्षण
- पार्टरनर पार्क पंडाल: नवमी रात्री में विशेष भव्य सजावट
कोलकाता के पंडालों में नवमी की आरती और कन्यापूजन का आयोजन अत्यंत भक्तिमय वातावरण में होता है। यहाँ भक्त माता दुर्गा से आशीर्वाद लेने आते हैं और परिवार के लिए सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
नवरात्रि नवमी – बिहार के प्रसिद्ध पंडाल
बिहार में नवमी दिन पर महा सिद्धिदात्री और कन्यापूजन के लिए कई प्रमुख पंडाल सजते हैं। यहाँ भक्त माता दुर्गा की पूजा और आराधना करने आते हैं।
- पटना – गांधी मैदान पंडाल: बड़ी मूर्तियाँ और सांस्कृतिक कार्यक्रम
- मुज़फ्फरपुर – लक्ष्मी पीठ: पारंपरिक पूजा विधि और भव्य सजावट
- गया – महाबली पंडाल: भक्तिमय वातावरण और विशेष आरती
- भागलपुर – रंग-बिरंगे थीम पंडाल: नवमी रात्री का खास आकर्षण
- नालंदा – शांति निकेतन पंडाल: नवमी की सांस्कृतिक प्रस्तुति और पूजा
बिहार के पंडालों में नवमी की आरती और कन्यापूजन का आयोजन भक्तिमय और आनंदमय वातावरण में होता है। यहाँ भक्त माता दुर्गा से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
नवरात्रि नवमी – आध्यात्मिक महत्व
नवमी दिन (महा सिद्धिदात्री) का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत उच्च माना जाता है। इस दिन साधक अपने मन और आत्मा की शक्ति को जागृत करने के लिए विशेष साधना और ध्यान करते हैं।
- मन की अशांति और तनाव दूर करने के लिए ध्यान करें।
- सकारात्मक विचारों और ऊर्जा का संचार बढ़ता है।
- मंत्र जाप से मानसिक शक्ति और ध्यान की क्षमता बढ़ती है।
- नवमी दिन साधना करने से आत्मिक शांति और मानसिक संतुलन प्राप्त होता है।
- माता दुर्गा की आराधना से इच्छाओं की सिद्धि और जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
नवमी दिन साधना, पूजा और कन्यापूजन के माध्यम से भक्तों का मन पूरी तरह से शुद्ध होता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है।
नवरात्रि नवमी – विशेष भोग और प्रसाद
नवमी दिन पर माता दुर्गा को अर्पित भोग और प्रसाद का विशेष महत्व है। इसे विधिपूर्वक अर्पित करने से मनोकामनाओं की पूर्ति और घर में सुख-समृद्धि आती है।
माता को अर्पित भोग
- खीर, हलवा और अन्य मिठाईयाँ
- फल – केले, सेब, संतरा, अंगूर आदि
- सिंघाड़ा, चने, और सब्ज़ी
- अक्षत (चावल) और तुलसी के पत्ते
- घी और दूध से बनी विशेष मिठाईयाँ
कन्याओं के लिए भोजन
- नौ कन्याओं के लिए शुद्ध और पौष्टिक भोजन तैयार करें।
- उनके सामने भोजन परोसें और हल्दी-चंदन से पूजन करें।
- भोजन के बाद कन्याओं को दक्षिणा और व्रत का प्रसाद दें।
- कन्याओं से आशीर्वाद प्राप्त करें और पूरे परिवार में सुख-शांति की कामना करें।
नवमी दिन के भोग और प्रसाद से माता दुर्गा का आशीर्वाद मिलता है और घर में समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशी बनी रहती है।
नवरात्रि नवमी – आध्यात्मिक संदेश और मन का संतुलन
नवमी दिन (महा सिद्धिदात्री) का आध्यात्मिक संदेश मन की शुद्धि, आत्मा की शक्ति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा को जागृत करना है।
- मन की अशांति और नकारात्मक विचारों को दूर करें।
- ध्यान और साधना के माध्यम से मानसिक संतुलन प्राप्त करें।
- सकारात्मक विचारों और ऊर्जा का संचार बढ़ता है।
- मंत्र जाप और कन्यापूजन से आत्मिक शक्ति और भक्ति भाव जागृत होता है।
- नवमी दिन साधना करने से जीवन में सफलता, स्वास्थ्य और खुशी बनी रहती है।
नवमी का आध्यात्मिक संदेश है कि मन, वचन और कर्म को शुद्ध रखते हुए माता दुर्गा की भक्ति और साधना करनी चाहिए। इससे जीवन में संतुलन, शांति और समृद्धि आती है।
नवरात्रि नवमी – अंतिम चरण और कन्यापूजन का समापन
नवमी दिन के अंत में पूजा और कन्यापूजन का समापन विशेष विधि से किया जाता है। यह दिन माता दुर्गा की पूर्ण आराधना और आशीर्वाद लेने का प्रतीक है।
अंतिम चरण
- पूजा स्थल को संजोकर अंतिम बार आरती करें।
- कन्याओं को प्रसाद और भोजन कराएँ।
- कन्याओं से आशीर्वाद लें और उन्हें दक्षिणा दें।
- मंत्र जाप और भक्ति भाव के साथ धन्यवाद अर्पित करें।
- पूजा समाप्त होने के बाद परिवार और मित्रों के साथ प्रसाद का वितरण करें।
नवमी का समापन करने से घर और मन में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। कन्यापूजन का यह अंतिम चरण माता दुर्गा के आशीर्वाद को प्राप्त करने और जीवन में सुख-समृद्धि लाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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| माँ सिद्धिदात्री |
नवरात्रि नवमी – संपूर्ण सारांश और अंतिम आशीर्वाद
नवमी दिन (महा सिद्धिदात्री) नवरात्रि का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन पूजा, मंत्र जाप, कन्यापूजन और भोग अर्पित करने से न केवल आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है, बल्कि मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा भी प्राप्त होती है।
नवमी दिन का पूरा दिन भक्तिमय और भावनाओं से भरा होता है। सुबह से लेकर शाम तक माता की आराधना, मन की शुद्धि, मंत्र जाप और कन्यापूजन का क्रम चलता है। इस दिन का अनुभव मन और आत्मा को गहराई से छूता है।
कन्याओं के माध्यम से माता का दर्शन, उनके आशीर्वाद और प्रसाद प्राप्त करना भावनाओं को बहुत संवेदनशील बना देता है। नवमी की रात, महा सिद्धिदात्री, सभी भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति का अवसर होती है।
साथ ही, नवमी का दिन यह याद दिलाता है कि कल माता की विदाई होगी। यह सोचकर हृदय में थोड़ी उदासी और भावुकता उत्पन्न होती है। माँ के आशीर्वाद और उनकी उपस्थिति की कमी का अहसास दिल को बहुत दहलाता है।
जैमा सिद्धिदात्री
नवमी का आखिरी दिन – जैमा सिद्धिदात्री, माँ की विदाई कल है, इससे दिल बहुत दहल जाता है। भक्त अपने मन में माँ की कृपा, आशीर्वाद और उपस्थित भाव को संजोते हैं। इस रात को ध्यान, भक्ति और भावनाओं के साथ मनाना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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