गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर।
गुरु साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।
कार्तिक पूर्णिमा 2025, गुरु नानक जयंती और सामा‑चकेवा पर्व
कार्तिक मास की पूर्णिमा 2025 में हम तीन महत्वपूर्ण पर्वों का महत्व एक साथ अनुभव कर सकते हैं — कार्तिक पूर्णिमा, गुरु नानक जयंती और मिथिला क्षेत्र का पारंपरिक सामा‑चकेवा पर्व। यह दिन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वर्ष 2025 में कार्तिक पूर्णिमा और गुरु नानक देव जी की जयंती एक ही दिन पड़ रही है — बुधवार, 5 नवंबर 2025। यह दिन हिंदू और सिक्ख दोनों धर्मों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा 2025 और गुरु नानक जयंती का महत्व
कार्तिक पूर्णिमा हिंदू धर्म में कार्तिक मास की पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है। इसे देव दीपावली भी कहते हैं क्योंकि इस दिन देवताओं के गंगा स्नान का उत्सव मनाया जाता है। गुरु नानक जयंती (गुरुपुरब) के रूप में सिक्ख धर्म में इसे गुरु नानक देव जी के प्रकाशोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
पूजा मुहूर्त 2025:
- पूर्णिमा तिथि आरंभ: 4 नवंबर 2025, रात 10:36 बजे
- पूर्णिमा तिथि समाप्ति: 5 नवंबर 2025, शाम 6:48 बजे
- स्नान मुहूर्त: सुबह 04:52 से 05:44
- पूजा समय: सुबह 07:58 से 09:20
- शाम का दीपदान समय: 17:15 से 19:05
इस दिन सुबह गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करने से पापों का नाश होता है। श्रद्धालु दिनभर व्रत रखते हैं और शुद्धता बनाए रखते हुए पूजा-अर्चना करते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा की कथा और पूजा विधि
पुराणों के अनुसार, असुर त्रिपुरासुर ने तीन लोकों में राज्य कर लिया था और सभी देवताओं को आतंकित किया। उस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का संहार किया, इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है।
कुछ कथाओं में कहा गया है कि भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण किया था, और देवताओं ने गंगा में स्नान कर अपनी पवित्रता प्राप्त की। इस दिन घाटों पर दीपदान का विशेष महत्व है।
पूजा विधि:
- स्नान के बाद साफ वस्त्र धारण करें।
- घर या मंदिर में दीपक जलाएं।
- भगवान विष्णु या शिव की प्रतिमा के सामने फूल, नैवेद्य, और प्रसाद अर्पित करें।
- दान करें — अनाज, भोजन या वस्त्र किसी जरुरतमंद को दें।
- रात में घर या घाट पर मिट्टी के दीप जलाकर वातावरण को पवित्र करें।
मंत्र / श्लोक:
- ॐ नमः शिवाय
- ॐ नमो नारायणाय
- इक ओंकार, सतनाम, करता पुरख
गुरु नानक देव जी की जयंती और उनके उपदेश
गुरु नानक देव जी का जन्म 1469 में तालवंडी (ननकाना साहिब, पाकिस्तान) में हुआ। वे सिक्ख धर्म के पहले गुरु हैं। उनके संदेश आज भी मानवता, समानता और सेवा का प्रतीक हैं।
मुख्य उपदेश:
- इक ओंकार: एक ही ईश्वर सर्वत्र है।
- नाम जापना: ईश्वर के नाम का स्मरण।
- किरत करनी: ईमानदारी से कर्म करना।
- वंड चकना: अपने संसाधन दूसरों के साथ बांटना।
- सेवा: बिना स्वार्थ के लोगों की मदद करना।
जयंती के दिन गुरुद्वारों में कीर्तन, भजन और लंगर का आयोजन किया जाता है, जिसमें सभी बिना भेदभाव भोजन करते हैं।
जीवन की सीख और सामाजिक महत्व
यह पर्व केवल धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि समाज को कई महत्वपूर्ण संदेश देता है:
- अंधकार पर प्रकाश की जीत का प्रतीक — दीपदान।
- समानता और मानवता का संदेश — गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ।
- सेवा और दान का महत्व — लंगर एवं दान की प्रथा।
- धार्मिक एकता — हिंदू और सिक्ख दोनों धर्म मिलकर इस दिन का उत्सव मनाते हैं।
प्रमुख स्थान जहाँ यह पर्व विशेष रूप से मनाया जाता है:
- वाराणसी — गंगा घाटों पर दीपदान।
- स्वर्ण मंदिर, अमृतसर — गुरु नानक जयंती के भव्य आयोजन।
- लुधियाना, फिरोजपुर, पंजाब के अन्य गुरुद्वारे।
- विश्वभर के सिक्ख समुदाय — अमेरिका, कनाडा, यूके आदि।
इस प्रकार, कार्तिक पूर्णिमा और गुरु नानक जयंती न केवल आध्यात्मिक महत्व रखते हैं, बल्कि यह सेवा, समानता और श्रद्धा का संदेश भी देते हैं।
धार्मिक रीति, मनाने का तरीका और फोटो सुझाव
इस पर्व को मनाने के लिए भक्त सुबह स्नान करके घर या मंदिर में पूजा करते हैं। दीप जलाने, मंत्रोच्चारण और दान देने की प्रथा है। सिक्ख समुदाय गुरुद्वारों में कीर्तन, भजन और लंगर का आयोजन करता है।
कार्तिक पूर्णिमा का पूजा विधान और कथा
कार्तिक पूर्णिमा हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र दिन माना जाता है। इस दिन देवी-देवता, विशेषकर भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। लोककथाओं के अनुसार, इस दिन त्रिपुरासुर नामक असुर ने तीन नगरों का निर्माण किया और संसार में अराजकता फैला दी। देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की और उन्होंने त्रिपुरासुर का संहार कर संसार में धर्म की स्थापना की। इस कारण इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहा जाता है।
दूसरी कथा के अनुसार, कार्तिक मास में गंगा देवी की उत्पत्ति हुई और इस दिन उनका स्नान करना विशेष पुण्यकारी माना जाता है। भक्त इस दिन स्नान, दीपदान और दान के माध्यम से पुण्य अर्जित करते हैं।
पूजा की तैयारी
- स्नान और शुद्धता: सुबह जल्दी उठकर शुद्ध पानी से स्नान करें। स्नान के बाद साफ और रंग-बिरंगे कपड़े पहनें।
- पूजा स्थल सजाना: घर में या मंदिर में पूजा स्थल को साफ करें, फूल, तुलसी, धूप, अगरबत्ती और दीपक रखें।
- दीपक जलाना: मिट्टी के दीपक तैयार करें और उन्हें शाम के समय जलाएं। यह दीपदान देवताओं के स्वागत और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।
- भोजन और प्रसाद: पूजा में फल, मिठाई और नैवेद्य अर्पित करें।
- दान और सेवा: जरूरतमंदों को भोजन या वस्त्र देना शुभ माना जाता है। दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
मंत्र और उच्चारण
इस दिन विशेष मंत्रों का उच्चारण करने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति होती है:
- ॐ नमः शिवाय — भगवान शिव की आराधना के लिए।
- ॐ नमो नारायणाय — भगवान विष्णु की पूजा के लिए।
- इक ओंकार, सतनाम, करता पुरख — गुरु नानक देव जी के आदर्शों का स्मरण।
- जय गंगां देवी — गंगा स्नान और आराधना के समय।
विविध रीति-रिवाज
कार्तिक पूर्णिमा के दिन कुछ विशेष रीति-रिवाज प्रचलित हैं:
- घाटों पर दीपदान — नदी के किनारे या घर के आँगन में दीप जलाना।
- व्रत और फलाहार — दिनभर उपवास रखना और केवल फल या हल्का भोजन करना।
- कथा सुनना और भजन करना — भक्तजन मंदिरों में कथा और कीर्तन सुनते हैं।
- दान और सेवा — जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या धन देना।
- संग्रह और पर्यावरण का ध्यान — कुछ स्थानों पर इस दिन मिट्टी के दीप जलाने की परंपरा होती है, जो पर्यावरण के अनुकूल होती है।
इस प्रकार, कार्तिक पूर्णिमा का दिन धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह केवल पूजा और व्रत का दिन नहीं है, बल्कि समाज में सेवा, दान और भक्ति के माध्यम से धर्म की स्थापना का प्रतीक भी है।
मिथिला का विशेष पर्व – सामा‑चकेवा
सामा‑चकेवा मिथिला क्षेत्र (बिहार और नेपाल के सीमावर्ती इलाके) में कार्तिक मास के समय मनाया जाने वाला एक अत्यंत लोकप्रिय और सांस्कृतिक पर्व है। यह पर्व भाई‑बहन के प्रेम, परिवारिक बंधन और सामाजिक मेल‑जोल का प्रतीक है।
कथा का सार
कथा के अनुसार, समा नाम की एक कन्या थी, जिसे झूठे आरोप के कारण पक्षी में बदल दिया गया। उसके भाई चकेवा ने अपनी भक्ति और तपस्या से उसे पुनः मानव रूप में वापस लाया। यही कारण है कि इस पर्व में भाई‑बहन के स्नेह और सुरक्षा की भावना को प्रमुखता दी जाती है।
पर्व मनाने की रीति‑रिवाज
- स्त्रियाँ शाम के समय नदी या तालाब के किनारे इकट्ठा होती हैं और हाथ में मिट्टी की बनी प्रतिमाएँ रखती हैं।
- सामा‑चकेवा की कथा पर आधारित मैथिली लोकगीत गाए जाते हैं।
- नाच‑गाना, गीत और लोक नाटक के माध्यम से बच्चों और युवाओं में सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ाई जाती है।
- त्योहार के अंत में प्रतिमाएँ जल में विसर्जित की जाती हैं, जो शुद्धि और समृद्धि का प्रतीक है।
- सामा‑चकेवा पर्व पक्षियों की प्रवास अवधि से भी जुड़ा माना जाता है और पर्यावरण‑मूलक संदेश देता है।
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
- यह पर्व भाई‑बहन के प्रेम और परिवारिक बंधन को मजबूत करता है।
- लोकगीत, नृत्य और समूहिक सहभागिता से सामाजिक मेलजोल बढ़ता है।
- पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के महत्व की सीख दी जाती है।
- संपूर्ण मिथिला क्षेत्र में यह उत्सव सामुदायिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बनता है।
निष्कर्ष
सामा‑चकेवा सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर और परिवारिक मूल्य का संदेश है। इस दिन भाई‑बहन, समुदाय और प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान को बढ़ावा दिया जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा की कथा — बिंदु‑बिंदु में
- त्रिपुरासुर का उत्पात : पुराणों के अनुसार असुर त्रिपुरासुर ने तीन दिव्य नगर बनाकर देवताओं एवं संसार को आतंकित कर दिया। 2
- भगवान शिव का तीर : इस दिन भगवान शिव ने एक ही तीर द्वारा त्रिपुरा को ध्वस्त कर दिया, इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा कहा जाता है — अज्ञान और अधर्म पर प्रकाश और धर्म की विजय। 3
- देवताओं का आनंद : विजय के उपरांत देवताओं ने दीप जलाकर उत्सव मनाया — यही कारण है कि इस दिन दीपदान की परंपरा बनी। 4
- मत्स्य अवतार : कुछ मान्यताओं में इस दिन विष्णु ने मत्स्य (मछली) अवतार लिया था — इस प्रकार यह दिन धर्म की रक्षा का प्रतीक भी बन गया। 6
- तुलसी‑विवाह एवं समापन : इस दिन तुलसी‑वृक्ष की पूजा और तिलक की रस्में भी की जाती हैं। कार्तिक मास का यह अंतिम दिन माना जाता है। 7
- गंगा स्नान एवं दीपदान : श्रद्धालु गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करते हैं तथा घाटों, घरों व मंदिरों में दीप जलाते हैं — जिसे “देव दीपावली” भी कहा जाता है। 8
- व्यापार‑समृद्धि का संकेत : उस समय से व्यापारी इस दिन अपने खाता‑खूबों का समापन व नए सौदों की शुरुआत करते आए हैं — इस तरह यह आर्थिक दृष्टि से भी शुभ माना गया है। 9
- धार्मिक‑सामाजिक एकता : हिंदू, सिक्ख और अन्य समुदाय इस दिन मेलजोल व सेवा‑भाव से जुड़ते हैं — सामूहिक पूजा, दीपदान व दान‑सेवा के माध्यम से। 10
इन बिंदुओं को ब्लॉग में अपनी भाषा व शैली में थोडा और विस्तारित कर सकती हैं — उदाहरण स्वरूप “घाटों पर राखी हुई दीयों की छटा” या “व्यापारी बही‑खाता खोलते समय का भाव” आदि जोड़ कर पाठक की रुचि और बढ़ सकती है।
कार्तिक पूर्णिमा की कथा और महत्व — नई बिंदु सूची
- मास का समापन: कार्तिक पूर्णिमा कार्तिक मास का अंतिम दिन है, जो व्रत, तपस्या और धर्म कर्म के चक्र का समापन दर्शाता है।
- त्रिपुरासुर का विनाश: असुर त्रिपुरासुर ने तीन नगर बनाए थे। शिवजी ने इस दिन उनका संहार किया, इसलिए इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहते हैं।
- देव दीपावली: इस दिन देवताओं ने दीप जलाकर अंधकार पर प्रकाश की विजय का उत्सव मनाया।
- मत्स्य अवतार: कुछ मान्यताओं में इस दिन विष्णु जी ने मत्स्य अवतार लिया, जिससे धर्म की रक्षा हुई।
- तुलसी‑विवाह: इस दिन तुलसी वृक्ष की पूजा और विवाह की परंपरा भी होती है, जिसे शुभ माना जाता है।
- स्नान और दीपदान: श्रद्धालु गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान करते हैं और घर, घाट व मंदिरों में दीप जलाते हैं।
- व्यापार और आर्थिक शुभ अवसर: व्यापारी इस दिन खाता-बही का समापन और नए सौदे शुरू करते हैं।
- भिन्न-भिन्न सांस्कृतिक उत्सव: महाराष्ट्र, तमिलनाडु, ओड़िशा आदि में अलग-अलग रीति से मनाया जाता है (जैसे Boita Bandana, Thirukarthigai Deepam)।
- मंत्र और कीर्तन: इस दिन विशेष मंत्र जाप, कीर्तन और ध्यान करने का शुभ अवसर होता है।
- सामाजिक मेल-जोल: मेले, सामूहिक भजन, कीर्तन और दीपदान से सामाजिक समरसता और उत्सव का अनुभव मिलता है।
इन बिंदुओं को विस्तार से समझने और जोड़ने से पाठकों की रुचि बढ़ती है। आप प्रत्येक बिंदु के नीचे संबंधित चित्र, दीप, नदी या उत्सव की फोटो भी जोड़ सकती हैं।
मिथिला क्षेत्र में सामा‑चकेवा पर्व की कथा, रीति‑रिवाज व महत्व
मिथिला (भारत‑नेपाल सीमा के आसपास) में कार्तिक मास में मनाया जाने वाला सामा‑चकेवा पर्व भाई‑बहन के प्रेम, पारिवारिक बंधन और प्राकृतिक चक्र का प्रतीक है। यह पर्व आमतौर पर छठ पूजा के बाद प्रारंभ होकर कार्तिक पूर्णिमा पर समाप्त होता है। 4
कथा का सार
पुराणों तथा लोककथाओं के अनुसार, सुहावने मिथिला की कथा इस प्रकार हैं:
समा नाम की एक कन्या थी, जिसे बिना दोष के झूठे आरोपों के कारण पक्षी रूप में बदल दिया गया। उसके भाई चकेवा ने गहरी भक्ति, तपस्या व समर्पण से उसे वापस मानव रूप दिलवाया। यह कथा सामाजिक रूप से “भाई‑बहन के बंधन” और “सत्य की विजय” का प्रतीक बन गयी है। 5
उत्सव‑रूप एवं रीति‑रिवाज
- उत्सव आमतौर पर कार्तिक शुक्ल पंचमी या सप्तमी से आरंभ होता है और पूर्णिमा (कार्तिक पूर्णिमा) तक चलता है। 6
- महिलाएँ एवं कन्याएँ मिट्टी से بنی छोटी‑छोटी प्रतिमाएँ बनाती हैं — जैसे समा, चकेवा, चुगला, पक्षी आदि — और उन्हें रंग‑रोगन कर बास्केट में सजाती हैं। 7
- शाम‑समय गंगा घाट या खुली जगह पर समूहित होकर गीत‑गायन, नृत्य, लोकगीत “सामा चके साम चके…” आदि गायी जाती हैं। 8
- उत्सव समाप्ति के दिन (कार्तिक पूर्णिमा) प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है — नदी, तालाब या खेत में। यह समा‑चकेवा की यात्रा या विदाई का प्रतीक माना जाता है। 9
प्रमुख प्रश्न‑उत्तर
क्या यह पर्व सिर्फ मिथिला में मनाया जाता है?
इस पर्व का मूल स्थान मिथिला है — बिहार, झारखंड, नेपाल के तराई‑क्षेत्रों में भी यह मनाया जाता है।
क्या इस का संबंध गुरु नानक जयंती या कार्तिक पूर्णिमा से है?
हाँ — इस पर्व की समाप्ति आमतौर पर कार्तिक पूर्णिमा के दिन होती है, जिससे यह एक तरह से उसी दिन की परंपरा से जुड़ जाता है।
अलग‑अलग बिंदु जो रोचक हैं
- मिट्टी‑से बनी प्रतिमाएँ पर्यावरण‑अनुकूल होती हैं और पक्षियों के हिमालय‑से‑मैदान प्रवास के समय‑सार को दर्शाती हैं।
- भाई‑बहन का प्रेम इस पर्व में मुख्य भावना है — बहनें अपने भाइयों की लंबी आयु एवं कल्याण की कामना करती हैं।
- लोकगीत, नृत्य और मिट्टी‑कला इस पर्व की सांस्कृतिक पहचान को बनाते हैं — इसे मैथिली संस्कृति का जीवंत अंग माना जाता है।
- युवाओं के कम हिस्सा लेने से इस परंपरा के लुप्त होने का भय है, इसलिए संस्कृति‑सहेजने की पहल चल रही है।
जहाँ यह सबसे प्रसिद्ध है
- मधेपश्चिम नेपाल के तराई‑क्षेत्र: सर्लाही, धनुषा, सप्तरी। 18
- भारत‑बिहार में मिथिला‑क्षेत्र जैसे दरभंगा, मधुबनी, सहरसा और आसपास के गाँव।
समापन व भाव
सामा‑चकेवा हमें याद दिलाता है कि प्रेम, समर्पण और भाई‑बहन के बंधन का महत्व केवल परिवार तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक‑सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। जब बहनें ऐसे गीत गा‑कर प्रतिमाएँ विसर्जित करती हैं, तब सिर्फ उत्सव नहीं होता, बल्कि एक संस्कृति का संदेश चलता है — प्रकृति‑संवाद, प्रेम‑भावना व सामाजिक एकता।
समापन और शुभकामनाएँ
कार्तिक पूर्णिमा, गुरु नानक जयंती और मिथिला के सामा‑चकेवा पर्व के माध्यम से हम न केवल पारिवारिक और सांस्कृतिक बंधनों को सुदृढ़ करते हैं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी अपने जीवन को समृद्ध बनाते हैं। यह पर्व हमें भाई‑बहन के प्रेम, समाज में एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देता है।
जब हम मिट्टी की बनाई प्रतिमाओं का विसर्जन करते हैं, दीपक जलाते हैं और पूजा करते हैं, तब हमारी आत्मा में शुद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इस पर्व का महत्व केवल मिथिला तक सीमित नहीं है; पूरे भारत और नेपाल में इसे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है।
आध्यात्मिक मंत्र और पाठ
आप अपने घर में इस दिन निम्नलिखित मंत्र और पाठ पढ़ सकते हैं, जो शुभता और सकारात्मक ऊर्जा लाते हैं:
- ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्। (गायत्री मंत्र – ज्ञान और प्रकाश के लिए)
- ॐ नमः शिवाय। (शिव मंत्र – शांति, समृद्धि और बुराई से मुक्ति)
- सर्वेषां शुभं करोति। (संपूर्ण परिवार और समाज की भलाई के लिए)
- यदि आप गुरु नानक जयंती के संदर्भ में पढ़ना चाहें: ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬਤ ਦਾ ਭਲਾ (गुरु नानक के संदेश अनुसार – सभी के कल्याण के लिए)
शुभकामना संदेश
इस पर्व पर सभी भाइयों और बहनों के बीच प्रेम, समझदारी और सहयोग बढ़े। सभी परिवार में स्वास्थ्य, समृद्धि और खुशहाली बनी रहे। आपके जीवन में यह पर्व सुख, सौभाग्य और आध्यात्मिक शक्ति लेकर आए।
"सभी भाइयों और बहनों को सामा‑चकेवा, कार्तिक पूर्णिमा और गुरु नानक जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ!"
"प्रकृति की सेवा, परिवार का प्रेम और आध्यात्मिक जागरूकता – यही इस पर्व का वास्तविक संदेश है।"



