विद्यापति शिव भक्ति कथा :- उगना के रूप में जब शिव जी अपने भक्त विद्यापति जी के नौकर बने


 उगना और विद्यापति के भक्ति प्रेम की कहानी के बारे में आप सब मिथिलावासी को ज्ञात होगा, मगर मैं चाहती हूं के बहुत से लोगों को यह कहानी ज्ञात हो मेरे इस ब्लॉग से. उगना शिव का रूप है, जो विद्यापति जी के यहां नौकर बन कर रहे ताकि विद्यापति जी के गीतों की रचना का आनंद ले सके. विद्यापति मैथिली के सर्वोपरि संस्कृत कवि और संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं. विद्यापति को मैथिल कवि कोकिल की उपाधि दी जाती है, उन्होंने प्रेम गीत और भक्ति वैष्णव गीत भी लिखे. विद्यापति जी ने अपनी रचनाओं में दुर्गा, काली, भैरवी, गंगा, गौरी आदि को शक्ति के रूप में वर्णित किया है. वह तिरहुत के शासक राजा गणेश्वर के दरबार में एक पुरोहित थें. विद्यापति की राजा शिव सिंह से घनिष्ठ मित्रता थी. उन्होंने मुख्य रूप से १३८० और १४०६ के बीच लगभग पाँच सौ प्रेम गीत लिखे उस अवधि के बाद उन्होंने जिन गीतों की रचना की, वे शिव, विष्णु, दुर्गा और गंगा की भक्तिपूर्ण स्तुति थे.


विद्यापति भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे, उन्होंने भगवान शिव पर अनेकों गीतो रचनाएं की है. विद्यापति की भक्ति और भगवान शिव का भक्ति प्रेम की कहानी, आज बहुत ही ज्यादा प्रख्यात है विद्यापति की गीतों की रचनाओं से भगवान शिव बहुत प्रभावित थे. विद्यापति के द्वारा लिखी गई अपने लिए लेख भगवान शिव को भक्तिमय कर जाते थे. भगवान शिव विद्यापति की भक्ति से बेहद प्रसन्न होकर विद्यापति के यहां नौकर के रूप में आए, उन्होंने अपना नाम उगना बताया, उस समय विद्यापति की आर्थिक हालत सही नहीं थी, इसलिए उन्होंने उगना को बतौर नौकर अपने घर में रखने से मना कर दिया मगर भगवान शिव कहां मानने वाले थे, उन्होंने विद्यापति जी से बिना पगार के सिर्फ दो वक्त का भोजन पर नौकरी करने के लिए मना लिया विद्यापति जी के घर में उनकी पत्नी, एक बेटा और एक बेटी थी, उगना के रूप में भगवान शिव विद्यापति जी की यहां नौकर बनकर उनकी सेवा करते और उनकी रचनाओं का आनंद लेने लगे, एक दिन विद्यापति राजा शिव सिंह के दरबार में जा रहे थे और उन्होंने उगना को भी अपने साथ ले गए. तेज गर्मी पड़ रही थी इसके कारण विद्यापति जी का गला सूखने लगा आसपास में पानी का कोई स्रोत नहीं था, प्यास से व्याकुल विद्यापति जी ने उगना को जल का प्रबंध करने के लिए कहा, विद्यापति जी को प्यास से व्याकुल देख उगना के रूप में भगवान शिव कुछ दूर गए और अपनी जटा खोली और एक लोटा गंगाजल ले आए, जल को पीते ही विद्यापति को गंगाजल के स्वाद का ज्ञात हो गया. वह आश्चर्यचकित थे की इस वन में दूर-दूर तक कोई जल का स्रोत नहीं है तो फिर उगना को गंगाजल कहां मिल गया तभी विद्यापति समझ गए कि उगना के वेश में भगवान शिव हैं और उन्होंने उनके चरण पकड़ लिए तब उगना के रूप में भगवान शिव को अपने वास्तविक रूप में आना पड़ा, भगवान शिव ने विद्यापति जी से कहा, मैं तुम्हारे साथ उगना बनकर रहना चाहता हूं, लेकिन कभी किसी को मेरा वास्तविक परिचय मत देना जिस दिन किसी को मेरा वास्तविक परिचय दोगे, मैं तत्क्षण ओझल हो जाऊंगा. इस पर विद्यापति ने भगवान शिव की सारी बातें मान ली विद्यापति जी को बिना मांगे अपने आराध्य भगवान शिव मिल चुके थे, वह बहुत ही ज्यादा प्रसन्न थे समय बीता गया एक दिन विद्यापति जी की पत्नी ने उगना को कोई काम दिया, और काम पूरा ना होने के कारण विद्यापति जी की पत्नी गुस्से में चूल्हे की जलती हुई लकड़ी से पीटने लगी तभी वहां विद्यापति आ गए और उनके मुख से अनायास ही निकल गया अरे “यह क्या अनर्थ कर रही हो यह तो साक्षात शिवजी जी है विद्यापति जी के मुंह से ये शब्द निकलते ही शिव अंर्तध्यान हो गए", इसके बाद विद्यापति पागलों की भांति "उगना रे मोर कतय गेलाह" कहते हुए उगना को वन में खेतों में हर जगह खोजते रहे, विद्यापति की मनोदशा देखकर शिव जी को दया आ गई और भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हो गए और कहां कि अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता लेकिन उसके प्रतीक चिन्ह के रूप में अब मैं शिवलिंग के रूप में तुम्हारे पास विराजमान रहूंगा. उसके बाद शिव अपने लोक लौट गए और उस स्थान पर शिवलिंग प्रकट हो गया. उगना महादेव का प्रसिद्ध मंदिर वर्तमान में मधुबनी जिले के भवानीपुर गांव में स्थित है। 


एक और कहानी उनके और देवी गंगा से जुड़ी कहानी बताती है,  एक दिन विद्यापति जी को यह आभास हुआ कि उनकी मृत्यु निकट आ चुकी है,  वह अपनी जिंदगी के आखिरी पल मैं मां गंगा के दर्शन करना चाहते थे मगर उमर की अधिकता के कारण वे लाचार थे तो, विद्यापति जी ने मां गंगा का स्मरण किया और कहा "हे मां गंगा मैं तुझ में समाना चाहता हूं मगर मैं लाचार हूं हे मां गंगा अब तू मुझे खुद में समा ले" इतना कहते ही मां गंगा विद्यापति जी के पास आ गई और विद्यापति जी उसमें समा गए. वह तिथि थी कार्तिक धवल त्रयोदशी, इस तिथि को देशभर में मैथिल समुदाय हर साल विद्यापति स्मृति पर्व मनाता है और जहां विद्यापति गंगा जी में समा गए उस जगह का नाम वाजिदपुर है जो बिहार राज के समस्तीपुर जिला में है. विद्यापति धाम के नाम से प्रसिद्ध है विद्यापति धाम में शिवलिंग के साथ इनकी भी पूजा होती है, भारी संख्या में लोग यहां दर्शन करने आते हैं स्थानीय लोगो में इनके प्रति बड़ी  श्रद्धा है

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