सावन में सीता माई की महिमा: जनकपुरी से उठती भक्ति की गूँज

 


🌸 सीता जी की मिथिला में सावन पूजा: एक अनुपम परंपरा 🌸

🔱 “जहाँ जनकपुरी की धरती पर सावन की पहली फुहारें गिरती हैं, वहीं सीता माई की स्मृतियाँ हर स्त्री के मन में हरियाली बनकर उग आती हैं...” 🌿


📖 सीता जी की सावन परंपरा: आस्था और प्रेम की कथा

मिथिला की पावन धरती, जहाँ माँ सीता ने जन्म लिया — वहाँ सावन का महीना केवल ऋतु नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और स्त्री-सम्मान का जीवंत उत्सव होता है। यहाँ की हर बूँद में जनक नंदिनी की स्मृति है, और हर हरियाली में उनके चरित्र का प्रतिबिंब।

जनकपुर, मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर और आसपास के गाँवों में यह मान्यता है कि सावन में वर्षा की हर बूँद सीता माई की करुणा और आशीर्वाद का प्रतीक होती है।

सावन में जब वधुएँ मायके आती हैं, तो माँ-बाप, भाई-बहन, सबका आंगन हरा हो जाता है — ठीक वैसे ही जैसे जनक जी का आँगन उस दिन हरा हुआ था, जब धरती ने सीता को उन्हें सौंपा था।

इसीलिए सावन के सोमवार, हरियाली तीज, मधुश्रावणी व्रत और “सीता अमर कथा” जैसे आयोजन मिथिला में एक विशेष भक्ति भाव से मनाए जाते हैं।


🌼 सीता-स्वयंवर की कथा: आँगन में गूँजती गाथा

💐 सावन की रातों में जब आकाश से फुहारें बरसती हैं, तब मिथिला की महिलाएँ अपने आँगन में तुलसी चौरा के पास बैठकर सामूहिक रूप से “सीता-स्वयंवर” की लोककथा गाती हैं।

"धरती की पुत्री सीता, वर खुद चुनेगी,
और धनुष उठाएगा वही, जो योग्य होगा..."

ये गीत स्त्रियों की आत्मशक्ति, उनकी पसंद का अधिकार और उनके सम्मान की परंपरा को दर्शाते हैं। ये केवल गीत नहीं, सीता माई के विचारों का पुनर्जागरण हैं।



💧 'सीता अमर कथा' और सप्तमी व्रत

मिथिला में सावन के प्रत्येक गुरुवार को महिलाएँ एक विशेष व्रत करती हैं — “सीता अमर कथा व्रत।” यह व्रत सात गुरुवारों तक चलता है और सप्तमी तिथि को विशेष रूप से मनाया जाता है।

📜 लोककथा के अनुसार, जब सीता जी ने धरती में प्रवेश किया, तो माँ पृथ्वी ने उन्हें अमर कर दिया। तभी से यह मान्यता है कि सावन में यदि कोई महिला सच्चे मन से सीता माई से कुछ माँगे, तो वे अवश्य सुनती हैं।

🌺 व्रत की विधि:

  • मिट्टी से सीता माई की छोटी मूर्ति बनाई जाती है 🌾
  • मूर्ति को तुलसी-दल, दूब, फूल, सिंदूर और महावर से सजाया जाता है
  • भोग में नारियल, चूड़ा, दही, बताशा और गुड़ अर्पित किया जाता है
  • महिलाएँ संकल्प लेकर कथा सुनती हैं और अंत में कहती हैं:
"सीता माई के चरणों में हमारा व्रत पहुँचे,
और हमारी गोदी सूनी न रहे।"

🌺 सीता माई और बरगद का पेड़ — एक लोककथा

जनकपुर के पास एक गाँव में आज भी एक प्राचीन बरगद का वृक्ष है जिसे ‘सीता माई के बरगद’ के नाम से जाना जाता है। कथा है कि जब सीता जी विवाह के बाद पहली बार मायके आयीं, तो उस बरगद के नीचे बैठीं और धरती की हरियाली को निहारते हुए कहा —

“हे धरती माई! मेरे विवाह से मेरा नाता टूटा नहीं, अब भी मैं तुम्हारी पुत्री हूँ। सावन का यह मौसम मुझे फिर से उसी गोद में लाया है।” 🌧️

तभी से उस बरगद को स्त्रियाँ सीता माई का प्रतीक मानकर सावन में राखी बाँधती हैं, उसके नीचे दीप जलाती हैं, और गीत गाती हैं:

“बरगद के छाँह में बइठली सीता,
हरियर चुनरिया उड़ल गगन में,
कहली – ‘माय के अँगना के माटी, हम भुला सकब?’” 🌳

📿 सीता स्तुति

या देवी सर्वभूतेषु, सीता रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

जानकीं रामसंपन्नां, नमामि जनकात्मजाम्।
विनीतां धर्मपत्नीं च, पतिव्रता शिरोमणिम्॥

इस स्तुति का पाठ सावन में हर गुरुवार को महिलाएँ करती हैं। यह उन्हें माँ सीता जैसी श्रद्धा और शक्ति पाने की प्रेरणा देता है।


🪔 ‘मायके की पुकार’ — विवाहिता स्त्रियों का भाव

सावन का समय न केवल पूजा का होता है, बल्कि स्त्रियों के भावनाओं का उत्सव भी होता है। मिथिला में ऐसा विश्वास है कि सावन में जब बहू मायके आती है, तो वह अपनी माँ, बहन, और बचपन की यादों के साथ सीता माई से कहती है:

“हे सीता माई, तोहरो संग परदेस गइल रही,
अब सावन में तोहर माई के गोदवा में अइली।” 🌦️

🌾 ‘माई सीता के फुलवारी’ — गाँवों की परंपरा

कई गाँवों में आषाढ़ पूर्णिमा के बाद से महिलाएँ एक विशेष स्थान पर फूलों की फुलवारी बनाती हैं जिसे “सीता के बगिया” कहा जाता है। वहाँ तुलसी, दूब, गुड़हल और चंपा के पौधे रोपकर रोज़ दीप जलाया जाता है।

“फुलवारी में सीता माई के स्वर,
हर पत्ते में आशीष भरल,
जे सच्चे मन से माँगब — उ जरूर पूरा होय।” 🌹

🌼 एक नवविवाहिता की प्रार्थना — सावन की पुकार

जनकपुर की एक स्त्री, जो विवाह के बाद पहली बार मायके लौटी, सीता माई के चरणों में यह प्रार्थना करती है:

“हे सीता माई! हमहूँ तोहर बेटी हई,
जइसे तू अपन धरम निभवली, हमहूँ निभाईब।
तू जैसे हर अपमान पर मौन रही, हमहूँ सहन करब।
तू जेकरा से प्रेम कईलू, सगरी जनम ओकरे नाम करब।” 🪔

🌸 पूजा की विधि और भावनात्मक रंग  🌸

सीता माई की यह पूजा विशेष रूप से बुधवार और शुक्रवार को की जाती है। महिलाएं भोर में स्नान करके पवित्र होकर घर के आंगन या तुलसी चौरे के पास बैठती हैं। वहाँ मिट्टी से बनीं सीता माई की प्रतिमा स्थापित की जाती है, और फिर आरंभ होती है पूजा—पूरे मन, श्रद्धा और आस्था के साथ।

🌿 दूब, बेलपत्र, पीपल की पत्ती, फूल, अक्षत और सिंदूर से माता को सजाया जाता है। जल, दूध और दही से स्नान कराकर उन्हें घर में बनीं सात प्रकार की पकवानों का भोग लगाया जाता है—जिसमें खीर, पूड़ी, तरुआ, दाल-भात, पिट्ठा जैसी पारंपरिक वस्तुएँ होती हैं।

💫 पूजा के बाद बहनें मिलकर सामूहिक गीत गाती हैं, जिनमें सीता माई के त्याग, वनवास और उनके पवित्र प्रेम की कहानियाँ गूँजती हैं। यह पूजा केवल देवी की आराधना नहीं होती, बल्कि यह स्त्री-संस्कृति की वह साधना है जो उन्हें एक-दूसरे से जोड़ती है, सशक्त बनाती है।

🌸 एक बहन जब सीता माई के सामने दीप जलाती है और कहती है—"हे माता, हमहूँ तोहर बेटी छी, हमरो दाम्पत्य जीवन में तोहर आशीर्वाद बनी रहे"—तो वह क्षण केवल भक्ति नहीं, वह स्त्री की आत्मा का उद्घोष होता है।


📅 2025 की प्रमुख तिथियाँ

  • 🌿 पहला सावन सोमवार: 14 जुलाई 2025
  • 💚 हरियाली तीज (मिथिला में विशेष): 27 जुलाई 2025
  • 🌼 मधुश्रावणी व्रत प्रारंभ: 15 जुलाई 2025 से
  • 🔱 सीता अमर कथा सप्तमी व्रत: 27 जुलाई 2025

🙏🏻 अंत में...

🌸 सावन का महीना केवल उत्सव या रीति नहीं, बल्कि सीता माई के प्रेम, त्याग और आदर्शों की स्मृति में डूब जाने का अवसर है।

यह वह समय होता है, जब स्त्रियाँ अपने सुख-दुख, प्रेम, पीड़ा — सब कुछ सीता माई के चरणों में अर्पित कर देती हैं।

“हे सीता माई, जनकपुर की रानी,
सावन में तुम्हारी यादें,
हर नारी के हृदय को पावन बनाती हैं।” 🕉️

🌿 जय सीता माई की! 🌿

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