. "सावन सोमवार का व्रत, एक स्त्री की तपस्या है — शिव को पाने की।"

 

🌺 सावन सोमवार व्रत: स्त्री का समर्पण और शिव-शक्ति की अमर कथा 🌺

श्रावण मास... एक ऐसा महीना जब धरती हरियाली से मुस्कुरा उठती है, जब आकाश से अमृत तुल्य वर्षा होती है, और जब हर गाँव-शहर में "हर-हर महादेव" की गूंज सुनाई देती है। यही वह पावन काल होता है जब स्त्रियाँ अपने अंतर्मन में गहरे संकल्प के साथ उठती हैं—अपने पति की दीर्घायु, प्रेम और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए भगवान शिव को समर्पित सावन सोमवार व्रत रखती हैं। यह व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक प्रेम, तपस्या और विश्वास की महागाथा है।

💫 एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक नवविवाहिता स्त्री थी जिसका पति व्यापार के सिलसिले में दूर देश गया हुआ था। श्रावण मास आया और उसकी सास ने उसे सोमवारी व्रत रखने का आग्रह किया। उस स्त्री ने पहली बार इस व्रत को श्रद्धा से किया—दिनभर उपवास रखा, शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और धतूरा अर्पण किया और मन ही मन भगवान शिव से प्रार्थना की: "हे शिव शंकर! जैसे माता पार्वती आपकी अर्धांगिनी बनीं, वैसे ही मैं भी अपने पति की सच्ची अर्धांगिनी बनूं। मेरी भक्ति मेरे पति को जीवन की हर आपदा से बचाए, उसे सुरक्षा, प्रेम और समृद्धि प्रदान करे।" उसने पूरे सावन, चार सोमवार का कठोर व्रत किया। और जैसे ही अंतिम सोमवार आया, उसके पति का पत्र आया कि वह सकुशल लौट रहा है। जब वह लौटा, तो उसने भावुक होकर कहा—“मुझे लगता रहा जैसे कोई दिव्य शक्ति हर कदम पर मेरी रक्षा कर रही थी। संकट आए, लेकिन मैं हर बार चमत्कारिक रूप से बच गया।” तब वह स्त्री मुस्कुराई और भगवान शिव के चरणों में श्रद्धा से शीश नवाया।

🌿 सावन सोमवार व्रत केवल भोजन न करना नहीं है, यह है श्रद्धा का एक सुगंधित पुष्प, जो शिव-पार्वती की कथा में भी झलकता है। माता पार्वती ने वर्षों तक कठिन तप करके भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था। उन्होंने न अन्न खाया, न जल पिया... केवल शिव का नाम जपती रहीं—“ॐ नमः शिवाय… ॐ नमः शिवाय…”। अंततः उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव स्वयं प्रकट हुए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाया। तभी से यह विश्वास बन गया कि — जो स्त्री श्रावण के सोमवार को सच्चे मन से व्रत करे, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है।

🌸 आज भी स्त्रियाँ सावन में विशेष भक्ति-क्रियाएँ करती हैं—सुबह स्नान करके सोलह श्रृंगार करती हैं, सफेद वस्त्र पहनती हैं, शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा चढ़ाती हैं और शिव-पार्वती का युगल पूजन करती हैं। वे मंत्र जाप करती हैं — “ॐ नमः शिवाय”, और रात में दीप जलाकर महा मृत्युंजय मंत्र पढ़ती हैं:

🕉️ "ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"

वे यह प्रार्थना करती हैं — "हे भोलेनाथ! जैसे माता पार्वती ने तप करके आपको पाया, वैसे ही मेरी आस्था मेरे परिवार में प्रेम, विश्वास और अखंड सौभाग्य बनाए रखे

🌿 📖 कथा: निर्धन ब्राह्मण कन्या और सावन सोमवार व्रत 

बहुत समय पहले की बात है, एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी और एक सुंदर कन्या के साथ रहता था। वह बहुत ही निर्धन था लेकिन धर्मात्मा था। उसकी पुत्री अत्यंत भक्तिमती और शिवभक्त थी।
जब वह कन्या विवाह योग्य हुई, तो ब्राह्मण बहुत चिंतित रहने लगा —
> "इतना निर्धन हूं, इस कन्या का विवाह कैसे करूंगा?"
🌸 कन्या ने पिता की चिंता देखी और बोली:
 "पिताजी, आप चिंता न करें। मैं सावन मास के सभी सोमवार का व्रत करूंगी और भोलेनाथ से प्रार्थना करूंगी कि वे मेरे लिए उत्तम वर दें।"
उसने पूरे सावन मास में सोमवार व्रत करना शुरू किया। हर सोमवार को निर्जला व्रत रखती, शिवलिंग पर जल, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत, दूध आदि अर्पण करती और "ॐ नमः शिवाय" का जाप करती।
🌼 उसकी अटूट भक्ति और निष्कलंक निष्ठा देखकर एक दिन स्वयं भगवान शिव ने स्वप्न में आकर उसे आशीर्वाद दिया —
> "हे कन्या! तुमने मन, वचन और कर्म से मेरी भक्ति की है। तुम्हें मैं स्वयं एक श्रेष्ठ पति दूँगा और तुम्हारे जीवन में सुख-शांति भर दूँगा।"
कुछ दिनों बाद एक राजा के मंत्री ने कन्या को देखा और उसके सद्गुणों और सुंदरता से प्रभावित होकर राजा के पुत्र के लिए उसका विवाह प्रस्ताव रखा।
🌺 धीरे-धीरे कन्या एक रानी बन गई, लेकिन वह कभी शिव भक्ति नहीं भूली। हर सावन सोमवार को वह व्रत रखती और मंदिर जाकर भगवान शिव को जल अर्पित करती।
🙏🏻 इस कथा से सीख:
जो श्रद्धा और विश्वास के साथ सावन सोमवार व्रत करता है, भगवान शिव उसकी हर मनोकामना पूर्ण करते हैं — चाहे वह विवाह हो, संतान की प्राप्ति हो, या जीवन में सुख-शांति।

🌕 श्रावण पूर्णिमा: पुण्य, रक्षासूत्र और ऋषियों की आराधना की परम तिथि 🙏

श्रावण मास के समापन पर आती है श्रावण पूर्णिमा — एक दिव्य तिथि, जो न केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है, बल्कि ऋषियों, देवताओं और ज्ञान की आराधना का भी पावन अवसर है। एक बार राजा युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा — “हे माधव! श्रावण पूर्णिमा का क्या महत्व है?” भगवान श्रीकृष्ण बोले — “हे राजन्! श्रावण पूर्णिमा के दिन ऋषियों को अन्न, वस्त्र और यज्ञोपवीत अर्पण करने से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। इस दिन देवगुरु बृहस्पति, महर्षि वेदव्यास और समस्त ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिए। इसी दिन से रक्षा-सूत्र बांधने की पवित्र परंपरा प्रारंभ हुई।”



🧵 रक्षा-सूत्र की उत्पत्ति का उल्लेख भी पौराणिक ग्रंथों में आता है। जब देव-दानव युद्ध में देवताओं की हार हो रही थी, तब इन्द्राणी ने भगवान विष्णु से रक्षा-सूत्र माँगा और मन्त्रों से सिद्ध करके उसे इन्द्र के दाहिने हाथ में बाँधा। इस दिव्य सूत्र की शक्ति से इन्द्र ने विजय प्राप्त की। तभी से रक्षा-सूत्र को रक्षा का प्रतीक माना गया और बहनों द्वारा भाई के हाथ में रक्षा बंधन बांधने की परंपरा भी यहीं से चली।

🌼 अतः सावन की यह पूर्णिमा न केवल राखी का त्यौहार है, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, देवी-देवताओं की आराधना और जीवन रक्षा के संकल्पों से जुड़ी हुई है।

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