“आबू सुनू! मधुश्रावणी समापन के टेमी गीत आउ हरियाली तीज के गौरी गीत"

मधुश्रावणी करती हुई महिलाएं भगवान की ध्यान में

पूजा करती हुई नववधू


🌸 हरियाली तीज और मधुश्रावणी व्रत 🌸
🌿 नवविवाहिताओं की मंगलकामना का पावन पर्व 🌿

📅 27 जुलाई 2025 को जब हरियाली तीज और मधुश्रावणी व्रत एक ही दिन पड़ रहा है, तो यह अवसर और भी शुभ, पवित्र और भावनाओं से भरा हो जाता है। यह दिन खास तौर पर नवविवाहिताओं और सुहागिनों के लिए अत्यंत मंगलकारी होता है।


🌼 हरियाली तीज की कथा और महत्व 🌼

हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। यह पर्व देवी पार्वती और भगवान शिव के मिलन का प्रतीक है। इस दिन स्त्रियाँ व्रत रखकर शिव-पार्वती से अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

मान्यता है कि कई जन्मों की तपस्या के बाद जब माता पार्वती ने शिव जी को पति रूप में पाया, तो उनका यह समर्पण हरियाली तीज के रूप में मनाया जाने लगा। विशेषकर नवविवाहिताएँ इस दिन झूला झूलती हैं, हरी चूड़ियाँ, हरे वस्त्र, मेंहदी, और सुहाग सामग्री धारण कर उत्सव मनाती हैं।

👰‍♀️ इस दिन नवविवाहित स्त्रियाँ मायके में होती हैं और सासु घर से उन्हें "सिन्धारा" भेजा जाता है, जिसमें मिठाइयाँ, वस्त्र, श्रृंगार का सामान और सौभाग्य की चीजें होती हैं।


🌿 मधुश्रावणी व्रत की विशेषता 🌿

मधुश्रावणी व्रत मिथिला में विशेष रूप से नवविवाहित स्त्रियाँ करती हैं। यह व्रत विवाह के पहले सावन में 13 दिनों तक मनाया जाता है और हरियाली तीज के दिन इसका समापन होता है।

व्रत के दौरान हर दिन एक नई कथा सुनी जाती है, जिसमें नाग-देवता, विषहरी, सास-बहू, और गउरी माता की कथा शामिल होती है। इस दौरान गउरी पूजन, नाग पूजा, गंध-माला चढ़ाना, और मांगलिक गीत गाना अति महत्वपूर्ण होता है।

🌺 विशेष रूप से, बहुएँ हर दिन गहनों से सजकर माता पार्वती की पूजा करती हैं और अपने पति के दीर्घायु जीवन की प्रार्थना करती हैं।


माता की पूजा करती हुई महिला

भक्त और भगवान


🎵 पारंपरिक मैथिली गीत — मधुश्रावणी विशेष 🎵

🌸 "भोरे उठि गउरी पूजौं..." 🌸

भोरे उठि गउरी पूजौं, धइली दूध के धार,
बिनु बोलावल चलली सखी, सुन गउरी के पुकार।

सिन्दूर देबौं माथ पर, पियर चीर पहिरबौं,
कजरा कंचन गहना सँ, गउरी जी के साजबौं।

नयना निहोरि कहे गउरी, बेटी चिर जियs,
हम तोरे संग रहबौं, जब तक फुल चढ़ीय।

तीन दिन त हम रहबौं, चौथे दिन चल जेतौं,
सिंदूर के सगुन लs, सासु घर पहुँचेतौं।

जिनगी भर जियs सुहागन, ये गउरी मैया कहे,
मांगल गीत सुनि मोर, नयन सागर बहे।

🌼 और गीत 🌼

ललना उठु जागू, गउरी जी के जागरण,
ओढ़नी सइन्हल, चीर पियर लागल।

सिन्दूर के डबिया लिअ, गउरी माथे देबs,
नथिया पहिरा, मांग में चमकावs।

भोरहि में उठि के पूजि गउरी,
साँझ के जपु नागिन रानी।

बीतल तीज, बीतल मधुश्रावणी,
गउरी बहिन के गोदी में ननदिया समानी।

गंगा जल ले अइली सासु, आशीष देली लंबा सुख,
भेल सुगंधित जीवन हमर, हरि से बंधल एखन युग।


मधु श्रावणी समाप्ति में टेमी का अद्भुत रिवाज करती हुई महिलाएं

टेमी का अद्भुत रीति रिवाज

🌿 टेमी के अवसर पर गाया जाने वाला प्रमुख गीत (लंबा और पूर्ण)

 ⚜️ गीत: हे गौरी मईया! दुल्हिन के राखिह सुहाग ⚜️

🌸 हे गौरी मईया! दुल्हिन के राखिह सुहाग,

सोलह सिंगार सजे, माथे रहै माँग।

🌸 ससुरारी गेली, गोरी मईया! ससुरारी गेली,

सिंदूर-दानी लेल, गोरी मईया! चूड़िया-बिछिया लेल।

🌸 माय-पीहर छोड़ि, पिया के अंगना आयल,

तोहर किरपा चाही, सदा सुहागिन रहि जाय।

🌸 पलँग पर बइठल, गोरी मईया! सखियन लगली गाबय,

‘टेमी-टेमी’ बाजे गीत, हर्षे सासु-ससुर।

🌸 गोर रंगवा पिया, ललाट सिंदूर,

कंगन-बालि चमके, नेहवा के नूर।

🌸 माथे टिकुली, गोरिया माई के किरपा,

हमरो अंगना महके सुहागन के दीप।

🌸 गौरी मईया के फूली चढ़े लाल पलाश,

ललका चुनरिया में, अँगना करे उजास।

🌸 हे गौरी मईया! दुल्हिन के राखिह सुहाग,

रोज चढ़ाइब फूल, मांगब तोहर आशीष।

🌸 गोर ससुरारी, मीठ गप-सप,

तोहर किरपा, बने रहै सब संबंध अपन।

🌸 टेमी के टोकरी, साजन भरतै,

हरियर साड़ी, गहना, चुनरी ओढ़ाबै।

🌸 संग सखियन के, गाबै गीत सुहाग के,

कहै गौरी मईया, तोहर नाम बड़ भाग के।

🌸 दुल्हिन रहै राजमती, पति के दुलारी,

घर में बरकत होय, नेहवाँ बनल रहै भारी।

🌸 माय के दुआ, सासु के आशीष,

हमार जीवन बनै, गौरी मईया! रसभरी पियास।

🌸 हे गौरी मईया! दुल्हिन के राखिह सुहाग,

भोर के पूजा में, तुअ नाम गाइब बारंबार।


🌺 गीत में क्या भाव छिपा है?

यह लोकगीत गौरी मईया से नवविवाहिता द्वारा की गई प्रार्थना है कि उनका सुहाग अमर बना रहे।

गीत में ससुराल की सुंदरता, पति के प्रति प्रेम, और नवविवाहित जीवन की मिठास को दर्शाया गया है।

"टेमी" (जो मधुश्रावणी के अंतिम दिनों में होता है) — उसमें यह गीत भावुकता, सौंदर्य और सौभाग्य की मंगल कामना से भरा हुआ होता है।


🌸 लोकगीत – "टेमी के गीत" 🌸

🎵 ~ टेमी देबई जाई छी महराज ~ 🎵

टेमी देबई जाई छी महराज,

मारु ननदी सन हँसी छी महराज।

टेमी देबई देबई हम बड़का पोखर,

आम के बोटे जाई छी महराज।

अंगना अंगना टेमी लोटे,

कते दिनक गाछी टेमी होइतो।

बड़का पोखर के ओरी,

ननदिया बहिनिया हँसी छी महराज।

टेमी में रोटी पसैरब,

भाई के नाम से घुटने टेकब।

सासु ससुर आशीष देथु,

पिया संग जीबन बीतब।

🌿 "टेमी बहा, दुख हर, सुख लाह",

एहि मनोकामना संग लोकगीत पूरा होई।



🌿 नवविवाहिताओं का यह पर्व क्यों विशेष? 🌿

हरियाली तीज और मधुश्रावणी व्रत दोनों स्त्री के जीवन की पहली सावन की अनुभूति से जुड़े हैं। यह वो समय है जब वह नववधू के रूप में अपने जीवन के नए चरण में होती हैं। गउरी जी की पूजा कर वह जीवन में ससुराल में स्नेह, प्रेम, सौभाग्य और सम्मान की प्रार्थना करती हैं।

पति-पत्नी अगर इस दिन एक साथ झूला झूलते हैं, तो लोक मान्यता है कि सौभाग्य का आशीर्वाद दोनों को प्राप्त होता है।


🔱 निष्कर्ष 🔱

यह पर्व केवल परंपरा नहीं, भावनाओं, संस्कारों और सौभाग्य की अनुभूति है। यह वो समय है जब स्त्रियाँ अपने भीतर की शक्ति और श्रद्धा से जुड़ती हैं।

🌸 हरियाली तीज और मधुश्रावणी — शिव-शक्ति के मिलन और नवविवाहिताओं की मंगल यात्रा का पर्व 🌸

🙏 जय गउरी शंकर 🙏

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