🌺 महा सप्तमी – साथवा दिन 🌺
सप्तमी के इस पावन दिन माँ कालरात्रि की पूजा और आराधना विशेष महत्व रखती है। इस दिन विशेष भक्ति और श्रद्धा के साथ पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। 🙏🖤
1. सातवाँ दिन – तिथि और महत्व
नवरात्रि का सातवाँ दिन (सप्तमी) इस वर्ष 29 सितंबर 2025, सोमवार को पड़ रहा है। यह दिन विशेष रूप से माँ कालरात्रि की आराधना का प्रमुख दिन माना जाता है। सप्तमी शब्द का अर्थ है 'सातवाँ', और इसे नवरात्रि के अंतिम सप्ताह के आरंभ के रूप में मनाया जाता है।
- इस दिन का उद्देश्य है अज्ञान, भय और शत्रुता का नाश करना।
- कन्याओं का पूजन इस दिन विशेष रूप से किया जाता है। घर में छोटी कन्याओं को आमंत्रित करके उन्हें भोजन, वस्त्र और उपहार देकर माता का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
- सातवाँ दिन भक्तों को साहस, मानसिक शक्ति और सामाजिक एकता का अनुभव कराता है।
- सातवाँ दिन पर्व का आध्यात्मिक महत्व भी है, जो जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और भक्ति भावना का संचार करता है।
सप्तमी का दिन भक्तों को अपने घर और समाज में सामूहिक पूजा और भजन-कीर्तन का आयोजन करने के लिए प्रेरित करता है।
2. पूजा का शुभ मुहूर्त और तैयारी
सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा के लिए समय और तैयारी बहुत महत्वपूर्ण होती है। यह दिन भक्तों को विशेष ध्यान और भक्ति से पूजा करने का अवसर देता है।
- स्नान और स्वच्छता: सुबह स्नान करके साफ वस्त्र पहनें।
- स्थापना: माँ कालरात्रि की प्रतिमा या चित्र को घर के पूजा स्थान में स्थापित करें।
- शुभ मुहूर्त:
- स्नान और स्थापना: 06:25 — 08:05
- मुख्य पूजा: 09:40 — 12:20
- रात्रि विशेष पूजा: 22:25 — 00:15
- कन्यापूजन की तैयारी: घर में छोटी कन्याओं के लिए जगह तैयार करें, साफ कपड़े, भोजन और उपहार रखें।
- पूजा सामग्री: लाल फूल, गुड़, खीर, चावल, सिंदूर, दीपक, धूप, और लाल वस्त्र।
- भजन, मंत्र और सप्तशती का पाठ करने के लिए पुस्तक या नोट्स तैयार रखें।
पूजा की तैयारी जितनी व्यवस्थित होगी, पूजा का लाभ और भक्ति भावना उतनी ही बढ़ती है।
3. देवी कालरात्रि का स्वरूप
माँ कालरात्रि नवरात्रि के सातवें दिन की आराध्या देवी हैं। उनका स्वरूप भीषण और शक्तिशाली होने के साथ करुणामयी भी है।
- रंग: गहरा काला, जो अंधकार और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करता है।
- केश: खुले और बिखरे हुए, जो शक्ति और स्वतंत्रता का प्रतीक हैं।
- हाथ: चार – अभय मुद्रा (भय नाश), वर मुद्रा (वरदान देने वाली), खड्ग (शत्रुओं का संहार), वज्र/शक्ति (सुरक्षा)।
- वाहन: गर्दभ (गधा), जो विनम्रता और धैर्य का प्रतीक है।
- आभूषण और वस्त्र: लाल वस्त्र और गहने, जो शक्ति और उत्साह का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- उनके भयंकर रूप का उद्देश्य भक्तों को भय से मुक्त करना और शत्रुओं का नाश करना है।
- कन्याओं का पूजन करने से भक्तों पर माँ की करुणा और सुरक्षा का विशेष प्रभाव होता है।
माँ कालरात्रि का स्वरूप हमें याद दिलाता है कि भय और अज्ञान का सामना साहस, भक्ति और आध्यात्मिक शक्ति से किया जा सकता है।
4. माँ कालरात्रि की कथा
माँ कालरात्रि की कथा महाभारत और देवी भागवत पुराण में वर्णित है। यह देवी राक्षस रक्तबीज के संहार के लिए प्रकट हुई थीं।
- रक्तबीज हर बूंद रक्त से नया उत्पन्न करता था, जिससे संसार में अराजकता फैल गई।
- माँ कालरात्रि ने भीषण रूप धारण करके उसका संहार किया और धरती को राक्षसों से मुक्त किया।
- उनकी शक्ति और भयंकर रूप ने सभी देवी-देवताओं और भक्तों को आश्वस्त किया कि संकट के समय देवी स्वयं रक्षात्मक शक्ति बनकर प्रकट होती हैं।
- कथा हमें यह सिखाती है कि जीवन में भय, कठिनाई और बाधाओं का सामना साहस, भक्ति और निर्णय शक्ति से किया जाना चाहिए।
- साथ ही, कन्याओं का पूजन इस दिन इसी आध्यात्मिक शक्ति और आश्वासन के प्रतीक के रूप में किया जाता है।
- कथा का संदेश: भय और नकारात्मकता पर विजय प्राप्त करने के लिए भक्तों को अपनी भक्ति, सच्चाई और साहस बनाए रखना चाहिए।
इस कथा के माध्यम से भक्तों को यह भी प्रेरणा मिलती है कि नकारात्मक शक्तियों का सामना करने में माता की कृपा और आशीर्वाद अत्यंत आवश्यक है।
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| छोटी-छोटी कन्यायें |
5. पूजा विधि और कन्यापूजन
सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा में शुद्धता और भक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण है। साथ ही, कन्याओं का पूजन इस दिन विशेष रूप से पुण्यकारी माना जाता है।
- स्नान और वस्त्र: सुबह स्नान करें और साफ लाल या पारंपरिक वस्त्र पहनें।
- स्थापना: देवी की प्रतिमा या चित्र को पूजा स्थल पर रखें और लाल फूल, गुड़, खीर और चावल अर्पित करें।
- मंत्र और पाठ: 'ॐ कालरात्र्यै नमः' का जाप करें। सप्तशती या देवी चालीसा का पाठ किया जा सकता है।
- दीप और धूप: पूजा के दौरान दीपक जलाएं और धूप का प्रयोग करें।
- कन्यापूजन:
- घर में छोटी कन्याओं को आमंत्रित करें।
- उनके पैर धोकर साफ वस्त्र पहनाएँ।
- भोजन, मिठाई और उपहार दें।
- कन्याओं का पूजन करने से घर में सुख, समृद्धि और माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- पूजा के अंत में आरती करें और प्रसाद वितरण करें।
कन्यापूजन करने से भक्तों के जीवन में भय का नाश, धन और सुख की वृद्धि तथा सामाजिक और आध्यात्मिक लाभ होता है।
6. पूजा का महत्व और लाभ
सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा का आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व अत्यंत बड़ा है। यह पूजा भय और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करने, जीवन में साहस और सकारात्मक ऊर्जा लाने के लिए की जाती है।
- भय और शत्रु नाश: देवी कालरात्रि का पूजन शत्रु और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है।
- संकट निवारण: जीवन में आने वाले कठिनाइयों और बाधाओं को दूर करने में मदद करता है।
- मानसिक शक्ति: भक्तों में साहस, आत्मविश्वास और मानसिक स्थिरता का विकास होता है।
- सामाजिक और आध्यात्मिक उत्थान: सामूहिक पूजा और भजन-कीर्तन से परिवार और समाज में एकता बढ़ती है।
- कन्यापूजन का महत्व: इस दिन कन्याओं को भोजन और उपहार देने से घर में सुख, समृद्धि और देवी का आशीर्वाद मिलता है।
- आध्यात्मिक लाभ: भक्तों को भय मुक्त जीवन, आध्यात्मिक विकास और जीवन में उजाला प्राप्त होता है।
इस दिन की पूजा से न केवल व्यक्तिगत लाभ होता है, बल्कि परिवार और समाज में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
7. घर में कैसे मनाएँ
सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा घर में भी विशेष भक्ति और उत्साह के साथ मनाई जाती है। घर पर पूजा का आयोजन सरल और सुंदर हो सकता है।
- पूजा स्थल सजावट: घर में पूजा स्थान को साफ करें, लाल और नारंगी रंग के फूल और वस्त्र का प्रयोग करें।
- दीप और धूप: पूजा के समय दीपक जलाएँ और धूप का प्रयोग करें।
- भजन और कीर्तन: परिवार के साथ भजन-कीर्तन का आयोजन करें।
- आरती: पूजा के अंत में आरती करें और सभी परिवारजनों को प्रसाद वितरित करें।
- कन्यापूजन: घर में छोटी कन्याओं को आमंत्रित करें, उनके पैर धोकर साफ वस्त्र पहनाएँ और भोजन व उपहार दें।
- सामूहिक भागीदारी: परिवार के सभी सदस्य पूजा में सहभागी हों, जिससे परिवार में एकता और सामूहिक भक्ति का अनुभव होता है।
घर में इस तरह से पूजा करने से भक्तों को माँ कालरात्रि की कृपा, भय और बाधाओं से मुक्ति तथा सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।

पंडाल
8. कोलकाता और पश्चिम बंगाल में उत्सव

पश्चिम बंगाल में नवरात्रि और विशेष रूप से माँ कालरात्रि का उत्सव भव्य और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होता है। कोलकाता और अन्य शहरों में पंडालों और झांकियों के माध्यम से यह पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।
- पंडाल सजावट: प्रत्येक पंडाल में माँ कालरात्रि की प्रतिमा को लाल फूलों और दीपों से सजाया जाता है।
- धुनुची नृत्य: भक्त नृत्य करते हुए देवी की स्तुति में शामिल होते हैं, ढोल और ढमाक की धुन में भक्ति प्रकट होती है।
- सांस्कृतिक कार्यक्रम: पंडालों में नाट्य, भजन और कीर्तन आयोजित होते हैं।
- प्रसाद वितरण: पंडालों और मंदिरों में मिठाइयाँ, खीर और फल भक्तों में बांटे जाते हैं।
- कन्यापूजन: बंगाली समुदाय में घर और पंडालों में कन्याओं का पूजन विशेष रूप से किया जाता है। उन्हें भोजन, वस्त्र और उपहार देकर देवी का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
- स्थानीय और पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए यह उत्सव पूरे क्षेत्र में श्रद्धा और भक्ति का संदेश फैलाता है।
इस प्रकार कोलकाता और पश्चिम बंगाल में सप्तमी का दिन सामूहिक भक्ति, सांस्कृतिक उत्सव और कन्यापूजन के माध्यम से बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
9. बिहार में उत्सव और कन्यापूजन
बिहार में नवरात्रि का सातवाँ दिन (सप्तमी) विशेष रूप से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में भव्य तरीके से मनाया जाता है। यहाँ का उत्सव स्थानीय परंपराओं, भजन-कीर्तन और सामूहिक गतिविधियों से भरपूर होता है।
- गाँव-गाँव में पूजा: घर-घर में देवी की प्रतिमा स्थापित कर भजन और आरती का आयोजन किया जाता है।
- सामूहिक प्रसाद वितरण: खीर, फल, मिठाई और अन्य प्रसाद गाँव के सभी लोग साझा करते हैं।
- रात्रि भजन-कीर्तन: रात में गाँव और शहर में भजन, कीर्तन और दीपदान का आयोजन किया जाता है।
- स्थानीय मंदिरों में विशेष आयोजन: मंदिरों में सांस्कृतिक कार्यक्रम और पूजा विधि का विशेष आयोजन होता है।
- कन्यापूजन का महत्व: घर में या मंदिरों में छोटी कन्याओं का पूजन किया जाता है। उन्हें भोजन, वस्त्र और उपहार देकर देवी का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
- भक्तजन मानते हैं कि इस दिन कन्याओं को सम्मान देने से घर में सुख-शांति, समृद्धि और देवी का विशेष आशीर्वाद आता है।
बिहार में सप्तमी का दिन परिवार और समाज में एकता, भक्ति और संस्कृति के उत्सव का प्रतीक है।
10. झारखंड और मिकला/मेघालय में उत्सव
झारखंड और मिकला/मेघालय में नवरात्रि का सातवाँ दिन स्थानीय संस्कृति और परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। यहाँ उत्सव में लोकनृत्य, सांस्कृतिक कार्यक्रम और आदिवासी रीति-रिवाज प्रमुख होते हैं।
- लोकनृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम: आदिवासी समुदाय पारंपरिक नृत्य, ढोल और बांस वाद्य के साथ देवी की स्तुति करते हैं।
- बंगाली समुदाय: कोलकाता और बंगाली पारंपरिक रीति के अनुसार पंडाल सजाए जाते हैं और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है।
- आदिवासी परंपराएँ: देवी की पूजा में स्थानीय फूल, फल और प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग किया जाता है।
- सांस्कृतिक मिलन: विभिन्न समुदाय एकत्र होकर पूजा और उत्सव में भाग लेते हैं।
- कन्यापूजन: घर और पंडालों में छोटी कन्याओं का पूजन विशेष रूप से किया जाता है। उन्हें भोजन, वस्त्र और उपहार देकर देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
- स्थानीय परंपराओं और आधुनिक सांस्कृतिक प्रभाव के साथ यह उत्सव बहुत ही हर्षोल्लासपूर्ण और भव्य होता है।
इस तरह झारखंड और मिकला/मेघालय में सप्तमी का दिन भक्ति, संस्कृति और कन्यापूजन के माध्यम से बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।
11. पूरे देश में उत्सव और कन्यापूजन
भारत के विभिन्न राज्यों में नवरात्रि का सातवाँ दिन (सप्तमी) भिन्न-भिन्न परंपराओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन प्रत्येक जगह भक्तिपूर्ण उत्सव और कन्यापूजन एक सामान्य विशेषता है।
- गुजरात: गरबा और डांडिया के साथ रात भर नृत्य, भजन और पूजा। कन्याओं का सम्मान और भोजन।
- उत्तर भारत: रामलीला, भजन, कीर्तन और आरती। घरों और मंदिरों में कन्याओं का पूजन।
- दक्षिण भारत: मंदिरों में पारंपरिक पूजा, दीपक, फूल और प्रसाद। कन्याओं का भोजन और उपहार।
- पश्चिम बंगाल: पंडालों में झांकियां, भजन-कीर्तन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और कन्यापूजन।
- बिहार, झारखंड, मिकला/मेघालय: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सामूहिक पूजा, भजन, दीपदान और कन्याओं का पूजन।
- देश के हर हिस्से में कन्यापूजन के माध्यम से समाज में सौहार्द, भक्ति और आध्यात्मिकता का संदेश फैलता है।
- कन्याओं को सम्मान देने से घर और समाज में देवी की कृपा, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।
सातवें दिन पूरे देश में उत्सव का स्वरूप स्थानीय रीति-रिवाजों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कन्यापूजन के माध्यम से बेहद हर्षोल्लासपूर्ण होता है।
12. अंतिम संदेश और प्रेरणा
सातवें दिन माँ कालरात्रि की भक्ति हमें भय, नकारात्मकता और कठिनाइयों से मुक्त होने का संदेश देती है। यह दिन आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यक्तिगत रूप से लाभकारी है।
- भय का नाश: माँ कालरात्रि का पूजन भय, शत्रुता और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करता है।
- साहस और मानसिक शक्ति: भक्तों में साहस, आत्मविश्वास और मानसिक स्थिरता का विकास होता है।
- परिवार और समाज में जुड़ाव: कन्यापूजन और सामूहिक पूजा के माध्यम से परिवार और समाज में एकता बढ़ती है।
- सकारात्मक ऊर्जा: पूजा से जीवन में उजाला, आनंद और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- आध्यात्मिक विकास: भक्ति, साधना और कन्यापूजन के माध्यम से आध्यात्मिक विकास होता है।
- माँ कालरात्रि की कृपा से भक्तों के जीवन में संकट कम होते हैं और सुख-समृद्धि बढ़ती है।
- कन्याओं का पूजन कर समाज में सम्मान, करुणा और समर्पण की भावना विकसित होती है।
इस प्रकार, सप्तमी का दिन केवल पूजा का दिन नहीं बल्कि जीवन में साहस, भक्ति और आध्यात्मिक उत्थान का प्रतीक है।
✨🌺 जय माता कालरात्रि 🌺✨
माता कालरात्रि की कृपा से आपके जीवन में भय और अंधकार दूर हों। साहस, शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो। हमेशा माँ की भक्ति और श्रद्धा बनाए रखें। 🙏🖤

