"नवरात्रि 2025 का छठवाँ दिन – षष्ठी व्रत: माँ कात्यायनी की पूजा विधि, कथा, भोग और आरती – सम्पूर्ण मार्गदर्शन"

माँ कात्यायनी सिंह पर सवार होती हैं। उनके चार हाथ हैं – एक हाथ में तलवार, दूसरे में कमल का फूल, तीसरा हाथ अभयमुद्रा में और चौथा वरमुद्रा में रहता है
माँ कात्यायनी माता


🌸 नवरात्रि का छठा दिन – माँ कात्यायनी 🌸

(षष्ठी तिथि – 28 सितंबर 2025, रविवार)

✨ महत्व ✨

नवरात्रि का छठा दिन माँ कात्यायनी की उपासना के लिए जाना जाता है। इस दिन की पूजा से साहस, आत्मबल और विजय प्राप्त होती है। अविवाहित कन्याएँ इस दिन माँ की विशेष आराधना करती हैं ताकि उन्हें मनचाहा वर प्राप्त हो।

🌺 देवी का स्वरूप 🌺

माँ कात्यायनी सिंह पर सवार होती हैं। उनके चार हाथ हैं – एक हाथ में तलवार, दूसरे में कमल का फूल, तीसरा हाथ अभयमुद्रा में और चौथा वरमुद्रा में रहता है। यह स्वरूप हमें सिखाता है कि धर्म और सत्य की रक्षा के लिए सदैव वीर और निडर बनना चाहिए।

🌿 विशेष मान्यता 🌿

शास्त्रों में वर्णन है कि माँ कात्यायनी की पूजा से विवाह संबंधी सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं। यह तिथि सुख-समृद्धि और दांपत्य सौंदर्य को बढ़ाने वाली मानी जाती है। साथ ही साधकों को आध्यात्मिक बल और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है।

📜 ऐतिहासिक महत्व 📜

पौराणिक कथा के अनुसार, कात्यायन ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके यहाँ पुत्री रूप में जन्म लिया। यही कारण है कि उनका नाम कात्यायनी पड़ा। महिषासुर जैसे शक्तिशाली राक्षस का वध कर उन्होंने देवताओं और समस्त प्रजा को भयमुक्त किया। इसलिए माँ कात्यायनी को “साहस और विजय की अधिष्ठात्री देवी” कहा जाता है।

🌼 जीवन में संदेश 🌼

नवरात्रि का छठा दिन हमें यह संदेश देता है कि हर समस्या का समाधान साहस और विश्वास से संभव है। यह दिन केवल उपवास और पूजा का ही नहीं, बल्कि शक्ति साधना का पर्व भी है। भक्त यदि श्रद्धापूर्वक आराधना करें तो जीवन में संतुलन, सफलता और सुख-समृद्धि स्वतः आ जाती है।

📅 नवरात्रि का छठा दिन – षष्ठी तिथि और पूजा समय

(28 सितंबर 2025, रविवार)

⏳ षष्ठी तिथि प्रारंभ और समाप्ति

षष्ठी तिथि आरंभ: 27 सितंबर 2025, शनिवार रात 11:18 बजे
षष्ठी तिथि समाप्त: 28 सितंबर 2025, रविवार रात 12:52 बजे

इस प्रकार मुख्य पूजा 28 सितंबर 2025 (रविवार) को ही की जाएगी।

🌸 पूजन का श्रेष्ठ समय

इस दिन प्रातःकाल स्नान करके माँ कात्यायनी की पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है। अभिजीत मुहूर्त (दोपहर 11:45 बजे से 12:32 बजे तक) और सायंकालीन संध्या पूजा (शाम 06:00 बजे से 07:30 बजे तक) विशेष रूप से मंगलकारी माने गए हैं।

🔯 क्यों है यह तिथि विशेष?

षष्ठी तिथि का महत्व केवल नवरात्रि के छठे दिन तक सीमित नहीं है। यह तिथि शक्ति साधना और विवाह संबंधी बाधाओं के निवारण के लिए विशेष मानी जाती है। जो साधक या साधिका श्रद्धा और नियम से इस दिन पूजा करते हैं, उन्हें जीवन के अनेक कष्टों से मुक्ति मिलती है और आत्मबल की प्राप्ति होती है।

एक औरत को माता कात्यायनी देवी की पूजा करते हैं
भक्त और भगवान


🌿 परंपरा और मान्यता

कई क्षेत्रों में षष्ठी तिथि को विशेष रूप से “कन्या पूजन” की शुरुआत का दिन भी माना जाता है। माता के भक्त इस दिन अपने घरों और मंदिरों में दीपक जलाते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और सायंकाल देवी का आरती एवं महाभोग लगाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह दिन मेलों और झाँकियों से भरा होता है, जबकि शहरी क्षेत्रों में पंडालों और डांडिया-गरबा की रौनक देखने को मिलती है।

🌺 माँ कात्यायनी का स्वरूप और दिव्य प्रतीक 🌺

👑 दिव्य स्वरूप

माँ कात्यायनी का स्वरूप तेजस्वी और वीरतापूर्ण है। वह सिंह पर सवार रहती हैं, जो शक्ति और निर्भीकता का प्रतीक है। उनके चार हाथ होते हैं: एक में तलवार, दूसरे में कमल का फूल, तीसरा हाथ अभयमुद्रा में और चौथा वरमुद्रा में।

उनका मुखमंडल पूर्णिमा के चंद्रमा के समान उज्ज्वल है और नेत्र कमल की पंखुड़ियों की भाँति हैं। वे दिव्य आभा से युक्त हैं और साधक को धर्म, साहस और विजय का वर देती हैं।

🗡️ प्रतीक और उनका अर्थ

  • सिंह: निर्भीकता और धर्म की रक्षा का प्रतीक।
  • तलवार: अन्याय और अधर्म के नाश की शक्ति।
  • कमल: पवित्रता, ज्ञान और समृद्धि।
  • अभयमुद्रा: भय से मुक्त करने का वचन।
  • वरमुद्रा: भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने का आशीर्वाद।

🌼 स्वरूप का संदेश

माँ कात्यायनी का स्वरूप हमें यह शिक्षा देता है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएँ, हमें साहस और धर्म का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। उनका सिंह वाहन बताता है कि शक्ति का प्रयोग केवल सत्य और धर्म की रक्षा के लिए होना चाहिए।

इस प्रकार, उनका हर प्रतीक भक्तों के जीवन में शक्ति, संतुलन और विजय का संदेश देता है।

🌼 माँ कात्यायनी की पूजा विधि 🌼

🛁 सुबह की तैयारी

छठे दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर को गंगाजल से पवित्र करें और पूजा स्थान पर माँ कात्यायनी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा स्थल पर पीले या लाल कपड़े का आसन बिछाएँ और उस पर माता की मूर्ति रखें।

🌸 पूजन सामग्री

  • गंगाजल, कलश, नारियल
  • रोली, अक्षत, चंदन
  • गंध, पुष्प (विशेषकर गुलाबी फूल)
  • धूप, दीपक और कपूर
  • शहद, गुड़, चना और शक्कर का भोग
  • नैवेद्य – फल, मिठाई और पंचामृत

🙏 पूजा विधि

कलश स्थापना करें और उसमें आम के पत्ते और नारियल रखें। माँ कात्यायनी को गंध, चंदन, पुष्प और धूप अर्पित करें। दीपक जलाकर मंत्र उच्चारण करें –

"ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥"

इसके बाद शहद और गुड़ का भोग लगाएँ और आरती करें। अंत में शांति और मनोकामना पूर्ति की प्रार्थना करें।

🌙 संध्या आरती

सायंकाल संध्या के समय दीप जलाकर माँ की आरती अवश्य करें। संध्या आरती का महत्व विशेष है क्योंकि इस समय की गई प्रार्थना से घर में शांति, सौहार्द और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

🪔 नियम और सावधानियाँ

  • पूजा के दौरान पूर्ण पवित्रता का पालन करें।
  • माँ को चढ़ाया गया भोग स्वयं न खाएँ, पहले परिवार और कन्याओं को दें।
  • इस दिन मदिरा, मांसाहार और नकारात्मक व्यवहार से दूर रहें।
  • भक्ति भाव और शुद्ध मन ही पूजा का सबसे बड़ा नियम है।

🌼 माँ कात्यायनी की विशेष कथा 🌼

✨ कथा की भूमिका

माँ कात्यायनी को शक्ति का अद्वितीय स्वरूप माना गया है। वे ऋषि कात्यायन की तपस्या से उत्पन्न हुईं और उनके ही घर जन्मी, इसीलिए उनका नाम "कात्यायनी" पड़ा। यह स्वरूप माँ दुर्गा का छठा रूप है, जो अत्यंत उग्र और दुष्टों का संहार करने वाला है।

🐂 महिषासुर का अत्याचार

प्राचीन कथा के अनुसार, महिषासुर नामक असुर ने कठोर तप कर ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि कोई भी देवता या असुर उसे पराजित न कर सके। वरदान पाकर उसने तीनों लोकों पर अपना अत्याचार करना शुरू कर दिया। देवता हारकर त्राहि-त्राहि करने लगे।

🌸 माँ कात्यायनी का प्रकट होना

महिषासुर से मुक्ति दिलाने के लिए सभी देवताओं ने अपनी शक्तियाँ एकत्र कीं। उसी तेज से एक दिव्य कन्या प्रकट हुईं, जिनका जन्म ऋषि कात्यायन के घर हुआ। वे ही थीं – माँ कात्यायनी, जिनके हाथों में तलवार, त्रिशूल, चक्र और कमल थे। उनका स्वरूप तेजस्वी और उग्र था।

⚔️ महिषासुर वध

माँ कात्यायनी ने महिषासुर से कई दिनों तक भयंकर युद्ध किया। जब महिषासुर ने महिष (भैंस) का रूप धारण किया, तब माता ने अपने त्रिशूल और तलवार से उसका संहार कर दिया। इस प्रकार देवताओं को पुनः स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई और संसार में शांति स्थापित हुई।

🌷 कथा का महत्व

  • माँ कात्यायनी अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध न्याय की स्थापना का प्रतीक हैं।
  • उनकी पूजा से जीवन में साहस, शक्ति और आत्मविश्वास की वृद्धि होती है।
  • विवाह योग्य कन्याओं को विशेष रूप से कात्यायनी देवी की पूजा करने से शीघ्र वर प्राप्त होता है।
  • यह दिन स्त्री-शक्ति और विजय का विशेष उत्सव माना जाता है।

📿 माँ कात्यायनी का मंत्र

"ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥"

इस मंत्र का जप करने से समस्त भय दूर होते हैं और साधक को विजय प्राप्त होती है।

भारत के पंडाल और दुर्गा माता की मूर्ति
पंडाल और दुर्गा माता की तस्वीर


🌼 विभिन्न क्षेत्रों में षष्ठी की परंपराएँ 🌼

🌸 कोलकाता और पश्चिम बंगाल

कोलकाता में षष्ठी का दिन दुर्गा पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। इस दिन पंडालों में माँ दुर्गा की प्रतिमा का बोधन, आमंत्रण और आदिवास होता है। शाम के समय "ढाक" (बड़े नगाड़े) और "धुनुची नृत्य" से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यहाँ की विशेषता यह है कि षष्ठी के दिन से ही भक्त माता को अपनी माँ के घर आई हुई बेटी की तरह मानकर उनका स्वागत करते हैं।

महिलाएँ लाल-bordered सफेद साड़ी पहनकर पूजा में शामिल होती हैं और माँ को सिंदूर, फूल और मिठाई अर्पित करती हैं।

🌿 मिथिला (बिहार-नेपाल क्षेत्र)

मिथिला में नवरात्र का महत्व विशेष होता है। यहाँ के लोग पूरे नौ दिनों तक उपवास रखते हैं और संध्या आरती, भजन-कीर्तन का आयोजन करते हैं। षष्ठी के दिन गाँव-गाँव और नगरों में मंडप सजाए जाते हैं और माँ कात्यायनी की भव्य पूजा होती है।

यहाँ की खास परंपरा है –

  • सुबह-सुबह महिलाएँ माटी के दिये जलाती हैं।
  • गृहस्थ लोग धान, दूब और गंगा जल से पूजा करते हैं।
  • भक्ति गीतों और मिथिला लोककथाओं के साथ पूजा का वातावरण और भी पवित्र बन जाता है।
मिथिला में यह दिन धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव दोनों रूपों में मनाया जाता है।

🪔 उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत

उत्तर भारत में षष्ठी का दिन माँ कात्यायनी की साहस और विवाह की देवी के रूप में पूजा जाता है। विशेषकर युवतियाँ इस दिन मन से व्रत रखती हैं ताकि उन्हें उत्तम वर प्राप्त हो सके।

मंदिरों में सुबह से कीर्तन, दुर्गा चालीसा पाठ और भोग का आयोजन होता है। शाम को रामलीला का मंचन भी शुरू हो जाता है, जिससे यह दिन और भी विशेष बन जाता है।

🌺 अन्य क्षेत्र

  • गुजरात और राजस्थान – षष्ठी की रात को गरबा और डांडिया का विशेष आयोजन होता है।
  • मध्य प्रदेश – मंदिरों में देवी के झाँकी सजती है और भक्त माता को चुनरी चढ़ाते हैं।
  • दक्षिण भारत – इसे नवरात्रि गोलू के रूप में मनाया जाता है, जहाँ घरों में देवी-देवताओं की मूर्तियों को सजाया जाता है।

🌼 षष्ठी का ज्योतिषीय महत्व 🌼

✨ ज्योतिषीय दृष्टि से महत्व

षष्ठी तिथि को शक्ति की तिथि माना जाता है। इस दिन चंद्रमा और गुरु का विशेष प्रभाव रहता है, जिससे साधना और व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है। माँ कात्यायनी को बृहस्पति ग्रह की अधिष्ठात्री देवी भी कहा गया है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जो कन्याएँ शीघ्र विवाह की इच्छा रखती हैं, उन्हें इस दिन व्रत रखकर माँ कात्यायनी का पूजन करना चाहिए। यह व्रत कात्यायनी व्रत के नाम से प्रसिद्ध है।

💍 विवाह हेतु विशेष महत्व

  • विवाह योग्य कन्याएँ माँ कात्यायनी की पूजा करके मनोवांछित वर प्राप्त कर सकती हैं।
  • यह व्रत अविवाहित कन्याओं को शुभ फल देता है।
  • वैवाहिक जीवन में शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए भी यह दिन श्रेष्ठ है।

🌷 विशेष उपाय

  1. सुबह स्नान कर पीले वस्त्र पहनें और माँ को पीले फूल अर्पित करें।
  2. शहद और गुड़ का भोग लगाएँ, इससे स्वास्थ्य और समृद्धि मिलती है।
  3. अविवाहित कन्याएँ माँ कात्यायनी मंत्र का 108 बार जप करें।
  4. इस दिन कन्याओं को भोजन कराना और उपहार देना विशेष पुण्यकारी है।
  5. अगर कुंडली में बृहस्पति या विवाह संबंधित दोष हों तो इस दिन पूजा करने से उनका शमन होता है।

📿 मंत्र जप का महत्व

"ॐ देवी कात्यायन्यै नमः॥"

इस मंत्र का 108 बार जप करने से विवाह के मार्ग में आ रही बाधाएँ दूर होती हैं और जीवन में सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

🌺 निष्कर्ष

षष्ठी का दिन केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन किए गए उपाय जीवन को सुखमय और सफल बनाते हैं।

🪔 षष्ठी व्रत – विधि और नियम 🪔

🌅 व्रत आरंभ

षष्ठी व्रत का आरंभ प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में करें। व्रत रखने वाले व्यक्ति को शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिए। स्नान के बाद पूजा स्थल पर माँ कात्यायनी की प्रतिमा स्थापित करें।

🌸 व्रत के दौरान नियम

  • इस दिन मांस, मदिरा और अनियमित आहार से बचें।
  • पूजा स्थल को स्वच्छ रखें और केवल शुद्ध जल का प्रयोग करें।
  • पूजा के समय ध्यान और भक्ति भाव को सर्वोच्च रखें।
  • अविवाहित कन्याएँ पूरे दिन फल और एक समय का भोजन कर सकती हैं।
  • दिन में कम से कम दो बार माता का जप या पाठ करें।

🪔 पूजा विधि

  1. कलश स्थापना करें और उसमें नारियल एवं आम के पत्ते रखें।
  2. माँ की प्रतिमा या चित्र पर गंगाजल छिड़कें।
  3. गुलाब और कमल के फूल अर्पित करें।
  4. दीपक जलाएँ और धूप, रोली, अक्षत अर्पित करें।
  5. माँ कात्यायनी मंत्र का जप 108 बार करें: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः
  6. शहद, गुड़, फल और मिठाई का भोग लगाएँ।
  7. आरती और भजन के साथ व्रत समाप्त करें।

🌿 फलित लाभ

  • व्रत से विवाह योग्य कन्याओं को शीघ्र वर प्राप्त होता है।
  • कठिनाइयाँ और भय दूर होते हैं।
  • साधक के घर में सुख, समृद्धि और शांति आती है।
  • साहस, शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

⚠️ सावधानियाँ

  • पूजा के दौरान अशुद्ध स्थान या अशुद्ध वस्तु का प्रयोग न करें।
  • व्रत के दिन झगड़ा और नकारात्मक क्रियाओं से बचें।
  • पूजा और व्रत में भक्ति भाव को सर्वोच्च रखें।
  • अविवाहित कन्याएँ माता को भोजन और भोग स्वयं अर्पित करें।

🪔 षष्ठी व्रत – विधि और नियम 🪔

🌅 व्रत आरंभ

षष्ठी व्रत का आरंभ प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में करें। व्रत रखने वाले व्यक्ति को शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिए। स्नान के बाद पूजा स्थल पर माँ कात्यायनी की प्रतिमा स्थापित करें।

🌸 व्रत के दौरान नियम

  • इस दिन मांस, मदिरा और अनियमित आहार से बचें।
  • पूजा स्थल को स्वच्छ रखें और केवल शुद्ध जल का प्रयोग करें।
  • पूजा के समय ध्यान और भक्ति भाव को सर्वोच्च रखें।
  • अविवाहित कन्याएँ पूरे दिन फल और एक समय का भोजन कर सकती हैं।
  • दिन में कम से कम दो बार माता का जप या पाठ करें।

🪔 पूजा विधि

  1. कलश स्थापना करें और उसमें नारियल एवं आम के पत्ते रखें।
  2. माँ की प्रतिमा या चित्र पर गंगाजल छिड़कें।
  3. गुलाब और कमल के फूल अर्पित करें।
  4. दीपक जलाएँ और धूप, रोली, अक्षत अर्पित करें।
  5. माँ कात्यायनी मंत्र का जप 108 बार करें: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः
  6. शहद, गुड़, फल और मिठाई का भोग लगाएँ।
  7. आरती और भजन के साथ व्रत समाप्त करें।

🌿 फलित लाभ

  • व्रत से विवाह योग्य कन्याओं को शीघ्र वर प्राप्त होता है।
  • कठिनाइयाँ और भय दूर होते हैं।
  • साधक के घर में सुख, समृद्धि और शांति आती है।
  • साहस, शक्ति और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।

⚠️ सावधानियाँ

  • पूजा के दौरान अशुद्ध स्थान या अशुद्ध वस्तु का प्रयोग न करें।
  • व्रत के दिन झगड़ा और नकारात्मक क्रियाओं से बचें।
  • पूजा और व्रत में भक्ति भाव को सर्वोच्च रखें।
  • अविवाहित कन्याएँ माता को भोजन और भोग स्वयं अर्पित करें।

🌼 पूजा में रंग, फूल और आभूषण का महत्व 🌼

🎨 रंगों का महत्व

माँ कात्यायनी की पूजा में विशेष रूप से लाल, पीला और गुलाबी रंग का उपयोग किया जाता है।

  • लाल: शक्ति, साहस और उत्साह का प्रतीक।
  • पीला: समृद्धि, पवित्रता और मंगल का रंग।
  • गुलाबी: प्रेम, सौम्यता और भक्ति भाव का संकेत।
पूजा स्थल को इन रंगों से सजाना और वस्त्र इसी रंगों के पहनना अत्यंत शुभ माना जाता है।

🌷 फूलों का महत्व

माँ कात्यायनी के पूजन में निम्नलिखित फूल विशेष रूप से उपयोग किए जाते हैं:

  • गुलाब: भक्ति और प्रेम का प्रतीक।
  • कमल: पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक।
  • गुड़हल/हिबिस्कस: शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक।
इन फूलों से माता की प्रतिमा या तस्वीर को सजाना शुभ माना जाता है।

💎 आभूषण और उनके लाभ

पूजा में माँ को सोनाऔर चाँदी के आभूषण चढ़ाए जाते हैं।

  • सोने के गहने: समृद्धि और वैभव का प्रतीक।
  • चाँदी के गहने: शुद्धता और मानसिक शांति का प्रतीक।
  • माँ की मूर्ति को रेशमी वस्त्र और आभूषण पहनाकर सजाना शुभ माना जाता है।
इससे भक्तों के घर में ऐश्वर्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

🌺 निष्कर्ष

पूजा में सही रंग, फूल और आभूषण का चयन भक्त की भक्ति को और बढ़ाता है। यह न केवल वातावरण को सुंदर बनाता है, बल्कि साधक के जीवन में शक्ति, सौभाग्य और आनंद भी लाता है।

दुर्गा माता की तस्वीर
दुर्गा माता की तस्वीर


🪔 षष्ठी की आरती और भजन विधि 🪔


🌆 संध्या आरती विधि

संध्या समय माँ कात्यायनी की आरती करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आरती के लिए दीपक जलाएँ, धूप और कपूर का प्रयोग करें। भक्त नीचे दिए गए क्रम में आरती करें:

  1. दीपक घुमाएँ और माता के चरण स्पर्श करें।
  2. आरती गाने के साथ भजन का पाठ करें।
  3. माँ को पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें।
  4. आरती के अंत में 'ॐ देवी कात्यायन्यै नमः' मंत्र का जप करें।

🎶 भजन और मंत्र

षष्ठी के दिन निम्न भजन और मंत्रों का पाठ करने से विशेष लाभ होता है:

  • “ॐ देवी कात्यायन्यै नमः” – 108 बार जप
  • कात्यायनी अष्टकम – माँ के 8 स्तोत्रों का पाठ
  • “जय माता कात्यायनी” भजन
  • सांझ के समय घर में भजन कीर्तन का आयोजन

🌷 आरती और भजन का महत्व

आरती और भजन करने से:

  • भक्ति भाव और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
  • सकारात्मक ऊर्जा और घर में सौभाग्य आता है।
  • साधक की मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं।
  • माँ की कृपा और शक्ति की अनुभूति होती है।

🌺 निष्कर्ष

संध्या आरती और भजन विधि षष्ठी तिथि का सर्वोत्तम आध्यात्मिक अनुभव है। इससे भक्त के जीवन में शक्ति, सौभाग्य और भक्ति भाव का संचार होता है।

🌼 षष्ठी के दिन कन्या पूजन और सामाजिक अनुष्ठान 🌼


👧 कन्या पूजन विधि

षष्ठी के दिन कन्याओं का पूजन अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन समाज और परिवार में कन्याओं को देवी का रूप मानकर सम्मानित किया जाता है:

  • सुबह कन्याओं को स्वच्छ वस्त्र पहनाएं और उनका स्नान कराएँ।
  • उनके चरणों में रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें।
  • कन्याओं को फल, मिठाई और उपहार दें।
  • भोजन के बाद उन्हें पूजन स्थल पर बैठाकर माँ कात्यायनी के मंत्र का पाठ करें।

🌿 सामाजिक अनुष्ठान

षष्ठी के दिन गाँव, शहर और मंदिरों में कई सामाजिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं:

  • भजन-कीर्तन और धार्मिक सभा का आयोजन।
  • सामूहिक कन्या पूजन, जहाँ सभी कन्याएँ एकत्र होकर माता की पूजा में भाग लेती हैं।
  • दान और सामाजिक सेवा, जैसे कि गरीब कन्याओं को भोजन और वस्त्र देना।
  • विद्यालयों और समाजिक संगठनों में नैतिक शिक्षा और स्त्री-शक्ति जागरूकता का कार्यक्रम।
यह दिन केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

🌸 क्षेत्रीय महत्व

कोलकाता: पंडालों में कन्या पूजन विशेष रूप से आयोजित होता है। मिथिला: गाँव-गाँव कन्याओं का सम्मान कर व्रतियों को प्रेरित किया जाता है। उत्तर भारत: मंदिरों में कन्याओं को भोग और उपहार देकर पूजन किया जाता है।

🌺 निष्कर्ष

कन्या पूजन और सामाजिक अनुष्ठान से समाज में भक्ति, नैतिकता और स्त्री-शक्ति का सम्मान बढ़ता है। यह दिन केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक सौहार्द का भी प्रतीक है।

🌼 षष्ठी के दिन विशेष भोग और नैवेद्य 🌼


🍬 विशेष भोग और नैवेद्य

माँ कात्यायनी को अर्पित किए जाने वाले भोग और नैवेद्य में विशेष ध्यान रखा जाता है। इस दिन निम्न वस्तुएँ अर्पित करना शुभ माना जाता है:

  • शहद और गुड़: स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए।
  • फल और खजूर: ऊर्जा और पोषण का प्रतीक।
  • दूध और हलवा: पवित्रता और भक्ति भाव।
  • नारियल और रवा के लड्डू: मनोकामना और सुख-समृद्धि।
भोग अर्पित करते समय मंत्र का उच्चारण और मन में भक्ति भाव रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

🌿 भोग का महत्व

भोग अर्पित करने से:

  • माँ की कृपा से घर में सुख, समृद्धि और शांति आती है।
  • साधक के जीवन में स्वास्थ्य और मानसिक शांति बनी रहती है।
  • कठिन परिस्थितियों में माँ का संरक्षण और मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

🌸 क्षेत्रीय भोग परंपराएँ

कोलकाता: प्रसाद में मिठाई, फल और नारियल का भोग।
मिथिला: शुद्ध गुड़, चावल और सत्तू का भोग।
उत्तर भारत: हलवा, चने और मीठे पकवान। यह भोग व्रती और कन्याओं को भी अर्पित किया जाता है।

🌺 समापन

इस प्रकार षष्ठी का दिन सम्पूर्ण भक्तिभाव, व्रत, पूजा, कन्या पूजन और भोग के माध्यम से माँ कात्यायनी की कृपा और शक्ति को समर्पित होता है। पूरे दिन की विधियाँ, मंत्र और भजन जीवन में सकारात्मक ऊर्जा लाते हैं।

🙏 जय माँ कात्यायनी! 🙏

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